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________________ तत्त्वार्थीचन्तामणिः ૨૨ द्रव्यपरिवर्तनमें अनन्तबार अगृहीतोंका ग्रहण कर पुन अनन्तवार मिश्रोंका ग्रहण कर फिर मध्य में गृहीत पुद्गलोंका अनन्तबार ग्रहण कर पुनः वे के वे ही पुद्गल उस जीवके नोकर्मपनेको प्राप्त होते हैं। असंख्यातसे अनन्तसंख्या बहुत अधिक है । कदाचित् ऐसे पूर्वोक्त प्रकारसे भाव हृदयमें उत्पन्न हो जाते हैं, किंतु श्री गोमट्टसारजीकी टीकामें पांचो परिवर्तनोंको उत्तरोत्तर अनन्तगुणा कालवाला बतलाया है । अतः उक्त शंका करना प्रशस्त मार्ग नहीं हैं। एक भावपरिवर्तन के समय में अनन्त भवपरिवर्तन हो -जाते हैं और अनन्तानन्त कालपरिवर्तन हो जाते हैं, तथा उससे अनंतगुणे क्षेत्र परिवर्तन और उससे भी अनंतगुणे द्रव्यपरिवर्तन हो जाते हैं । त्रिकाल त्रिलोकदर्शी सर्वज्ञ केवलज्ञानीके आम्नायानुसार चले आये हुए आगमसे जो निर्णीत हुआ है वही सत्यार्थ है । आगमके अनुसार चलनेवाली युक्तियां सुयुक्तियां है। और आगमके प्रतिकूल युक्तियोंको कुयुक्तियां कहते हैं । द्रव्यपरिवर्तन के अनंतकालसे क्षेत्रपरिवर्तनका काल अधिक है । क्योंकि तीन लोकमें थोडेसे स्थानपर स्थित होकर जन्म मरण करता हुआ भी अनेक द्रव्यपरिवर्तन कर सकता है। किंतु आकाशके प्रदेशोंपर यथाक्रमसे जन्म लेने में बहुत अधिक समय लगेगा। तीन लोकमें निगोद शरीरको धारण करता हुआ जन्म लेना सुलभ है, परंतु उत्सर्पिणीके समयोंका व्यवहार रखते हुए जन्म, मरण, करना विलम्बसाध्य कार्य है, तथा लोकाकाशके क्रमानुसार आये हुए प्रदेशोंपर तो दूसरीही आगेकी पर्यायमें जन्म लेना सम्भव है। किंतु कालपरिवर्त्तनमें तो एकबार जन्म ले चुकनेपर वीस कोटा कोटीसागरका अंतर डालना आवश्यक है। तब कहीं अग्रिम समय में जन्म लेनेका नम्बर आ सकता है, एवं इसकी भी अपेक्षा उत्कृष्ट रूपसे केवल दो सहस्र सागरतक ठहरनेवाली त्रस व्यवहारराशिमें आकर मनुष्य, देव, नारकी और तिर्यों में निगोद या स्थावरको छोडकर शेष तिर्यञ्चोके जन्म लेना विलम्बसाध्य है । किसी भी देव, तिर्यच, आदिकी पर्यायमें जन्म लेकर कल्पकालके समयोंको यथाक्रमसे पूरा किया जा सकता है । किंतु भवपरिवर्तनमें तो विवक्षित एक ही गतिमें उसके योग्य सभी जन्मोंको लेना पडेगा, तब दूसरी गतिका नम्बर प्रारम्भ किया जायगा । धवल आदि सिद्धांतग्रन्थोंके अध्ययनका जिनको अधिकार है वे विद्वान् इसका अधिक युक्तियोंसे निर्णय कर लेवें । हम इससे अधिक और क्या कहें कि आगमप्रमाणसे निर्णीत किये विषयोंमें अधिक युक्तियोंकी आवश्यकता नहीं है । इन सबसे भी बडा भाव - परिवर्तन प्रसिध्द ही है । जिसमें कि श्रेणीके असंख्यातवें भाग योग असंख्यात लोकप्रमाण कषायबंधाध्यवसायस्थान और उससे भी असंख्यात लोकगुणे अधिक अनुभाग बन्धाध्यवसाय स्थानोंपर पूर्वोक्त क्रमसे संज्ञी जीवके अन्तः कोटाकोटी प्रमाण कर्मोकी स्थितिसे लेकर ज्ञानावरणकी तीस कोटाकोटी सागर तककी स्थिति समयाधिकक्रमसे पूर्ण की जाती हैं, इसी प्रकार कमाँकी जघन्य स्थिति अन्त आठमुहूर्त्त आदिसे लेकर उत्कृष्टस्थिति पर्यंतवाली मूलप्रकृति और संपूर्ण एक एक उत्तरप्रकृतियोंका परिवर्तन करना पडता है । अनंतवर्षो में पूर्ण होनेवाले इस संपूर्ण संसरणका नाम भावपरिवर्तन है। इसमें भी जघन्य स्थितिके जितने समय हैं उतनी बार जघन्य स्थितिवाले कर्म बांधने पडेंगे, तभी
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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