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________________ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके प्रधानतया पृष्टेः पूर्व तयोरपृष्टेरपुनरुक्तता । षष्ठेऽपि नास्तित्वावक्तव्यतयोस्तथा पृष्टेरेव सप्तमे क्रमाक्रमार्पितयोः सत्त्वासत्त्वयोः प्रधानतया पृष्टेः कुतः पौनरुक्त्यम् ? शंकाकार कहते हैं कि इस प्रकार तो तीसरे, चौथे, आदि प्रश्नोंको भी पुनरुक्तपनेका प्रसंग हो जायगा । केवल पहिला और दूसरा प्रश्न ही ठीक तौरसे अपुनरुक्त रक्षित हो सकेगा। आचार्य कहते हैं कि सो यह तो न कहना। क्योंकि तीसरेमें पहिले दो भंगोंको क्रमसे प्रधानपने करके पूछा गया है । पहिले अथवा दूसरेमें तो तिस प्रकार क्रमसे वे दोनों नहीं पूछे जा चुके थे। किन्तु अकेले सत्त्वको ही प्रधानरूपसे पहिलेमें पूंछा गया है और दूसरेमें प्रधानरूपसे असत्त्वको ही पूंछा गया है । एवं चौथे प्रश्नमें तो दोनोंके साथ कहनेकी प्रधानतासे पूछा गया है । अतः पुनरुक्तपना नहीं है । क्योंकि पहिले प्रश्नोंमें दो धर्मोका युगपत् रहनापन विवक्षित नहीं हो चुका है। इसी प्रकार पांचमेंमें तो अस्तिपन और अवक्तव्यत्वको प्रधानपनेसे पूंछा गया है। पहिले प्रश्नोंमें उन दोनोंको नहीं पूंछा गया था। इस कारण पांचमेंमें भी अपुनरुक्तपन है । तथैव छठवेंमें भी प्रधानता नास्तित्व और अवक्तव्यपनको ही पूंछा है । अन्य भंगोंमें तिस प्रकार नहीं पूछा गया है । ऐसी ही सातवेंमें क्रमसे सत्त्व, असत्त्व, और अक्रमसे विवक्षित किये गये सत्त्व असत्त्वके अवक्तव्यकी प्रधानतासे प्रश्न किया गया है। अतः पिछले पांच भंगोंमें भला कैसे पुनरुक्तपना आया ? अर्थात् नहीं। ये सातों प्रश्न अपुनरुक्त हैं । इनके उत्तरमें स्याद्वादी वक्ताकी ओरसे दिये गये सात उत्तर उपयुक्त हैं। ___ नन्वेवं तृतीयस्य प्रथमेन संयोगे द्वयोरस्तित्वयोरेकस्य नास्तित्वस्य प्राधान्याद् (१) द्वितीयेन संयोगे द्वयोर्नास्तित्वयोरेकस्यास्तित्वस्य क्रमशः पृष्टेना(२)पुनरुक्ततास्तु पूर्व तथा पृष्टेरभावात् । तथा चतुर्थस्य पञ्चमेन संयोगे द्वयोरवक्तव्ययोरेकस्यास्तित्वस्य षष्ठेन संयोगे द्वयोरवक्तव्ययोरेकस्य नास्तित्वस्य ( ४ ) सप्तमेन संयोगे द्वयोरव्यक्तयोरेकस्यास्तित्वस्य नास्तित्वस्य (५) च क्रमेण प्रधानतया पृष्टेने पुनरुक्तता तथा पञ्चमस्य षष्ठेन संयोगे द्वयोरवक्तयोरेकस्यास्तित्वस्य नास्तित्वस्य (६) पृष्टेः पञ्चमस्य सप्तमेन संयोगे द्वयोरवक्तव्ययोरस्तित्वयोश्चैकस्य नास्तित्वस्य प्रधानतया पृष्टस्तथा (७) षष्ठस्य सप्तमेन संयोगे द्वयोरवव्यक्तव्ययो स्तित्वयोश्चैकस्यास्तित्वस्य (८) सप्तमस्य प्रथमेन संयोगे द्वयोरस्तित्वयोरेकस्य नास्तित्वावक्तव्यस्य (९) च द्वितीयेन संयोगे द्वयोर्नास्तित्वयोरेकस्यास्तित्वस्यावक्तव्यस्य (१०) च तृतीयेन संयोगे द्वयोरस्तित्वयोनास्तित्वयोश्चैकस्यावक्तव्यस्य क्रमशः (११) प्रधानभावेन पृष्टेर्न पुनरुक्तत्वमिति तत्पति वचनानामप्येकादशानामपुनरुक्तत्वसिद्धेरष्टादशभंगास्तथा संयोगे च भंगान्तराणि सिध्येयुस्तथा तत्संयोगेऽपि ततो भंगांतराणीति कथं शतभंगी निषिध्यते ? द्विभंगीप्रसंगादिति केचित् ।
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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