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________________ १२० तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके देशके द्वारा उपकृत होती है ऐसा कहना प्राप्त हुआ किन्तु वह कहना तो युक्त नहीं है। क्योंकि अतिप्रसंग हो जावेगा । भावार्थ-जड शरीरके लिये ही तत्त्वोपदेश यदि उपयोगी होगा तो मृत शरीर अथवा घट, पट, गृह आदि भी उपदेशको प्राप्त करनेके पात्र बन जावेंगे । जो कि दोनों ओरसे उपदेशके योग्य नहीं माने गये हैं । तिस कारण सिद्ध होता है कि जीवके लिये ही तत्त्वोंका उपदेश होता है इस प्रकार जीव पदको आदिमें कहनेकेलिये दिया गया हमारा हेतु असिद्ध नहीं है । तत्त्वोपदेश जीवके लिये ही है यह बात अच्छे प्रकारसे सिद्ध कर दी गयी है । जीवादनन्तरमजीवस्याभिधानं तदुपग्रहहेतुत्वात् । धर्माधर्माकाशपुद्गलाद्यजीवविशेषा असाधारणगतिस्थित्यवगाहवर्तनादिशरीरायुपग्रहहेतवो वक्ष्यन्ते । जीवसे अव्यवहित पीछे अजीवका कथन है । क्योंकि उस जीवका उपकार करनेवाला कारण अजीव पदार्थ है । जीवके पीछे अजीवको कहनेमें उपकार्य उपकारक भाव सम्बन्ध प्रयोजक है । अजीवके विशेष भेद तो धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल और आदि पदसे काल ये पांच हैं। कालद्रव्यके असंख्यात और पुद्गलके अनन्त ये अवान्तर भेद हैं । धर्म द्रव्यका असाधारण उपकार जीव और पुद्गलकी गति करनेमें उदासीन कारण होता है। और अधर्म द्रव्यका असाधारण उपकार जीव आदि दो अथवा छहों द्रव्योंकी स्थिति रखनेमें उदासीन कारणपना है। तथा आकाश द्रव्यका उपकार सम्पूर्ण द्रव्योंको अवगाह देना है। कालद्रव्यका उपकार सम्पूर्ण द्रव्योंकी वर्तना कराना है । सम्पूर्ण द्रव्य स्वभावसे वर्तन करते हैं, किन्तु चाकके घूमनेमें कीलके समान सब द्रव्योंके वर्तनमें उदासीन प्रेरक काल द्रव्य है । प्रत्येक समयमें अपनी सत्ताका अनुभव करती हुयी उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य, से रहित होरहे द्रव्योंकी प्रत्येक पर्यायका परिवर्तनरूप परिणतिको वर्तना कहते हैं । परिणाम ( अपरिस्पन्द ) क्रिया ( परिस्पन्द ) परत्व, अपरत्व, ( आयुष्यसे किया गया बडा छोटापन ) ये भी काल ( व्यवहार काल ) के उपकार हैं, यह आदि पदका अर्थ समझा जाय । शरीर, वचन, आठ . पत्तोंसे विकसित हुये कमलके समान हृदयमें बना हुआ द्रव्यमन, श्वास उत्श्वास, सुख दुःख आदि उपकार तो पुद्गलद्रव्यके द्वारा जीवको प्राप्त होते हैं । इन उपकारोंके कारण धर्म आदिक द्रव्य पांचवें अध्यायमें ग्रन्थकारके द्वारा स्वयं स्पष्टरूपसे निरूपित किये जायेंगे। द्रव्यात्रवस्याजीवविशेषपुद्गलात्मककर्मास्रवत्वादीकानन्तरमभिधानं, भावास्रवस्य जीवाजीवाश्रयत्वाद्वा तदुभयानन्तरम् । पांचप्रकारके अजीवोंमें एक विशेषद्रव्य पुद्गल है । कर्म नोकर्मका आगमनरूप द्रव्यास्रव पुद्गल रूप है । कर्म, नोकर्म, पुद्गलरूप हैं । उनका आना उन्हींका पर्याय है । जैसे कि देवदत्तका आना देवदत्तका ही परिणाम है । पर्यायीसे पर्याय अभिन्न है । इस कारण अजीवके अनन्तर आस्रवतत्त्वका कथन किया है । और मिथ्यादर्शन, अविरति, कषाय अथवा काययोग, वचनयोग, मनोयोग ये भाकास्रव हैं । जीव और अजीव दोनों द्रव्योंका आश्रय लेकर उक्त भाव उत्पन्न होते हैं इस कारणसे
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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