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________________ तत्त्वार्थचिन्तामणिः १०३ तत्त्वका श्रद्धान होना नहीं बन सकता है और पुण्य पापके अतिरिक्त बन्धतत्त्वका होना ही असम्भव है । बन्ध होवे किसका ? तथा पुण्यपापबन्धके विना बन्धतत्त्व ही व्यर्थ ( फलरहित ) है। अर्थात् द्रव्यकर्मबन्धसे उत्पन्न हुए अज्ञान, राग, द्वेष, मोह अनुत्साह आदि भावकर्मबन्ध हैं । सौ प्रकृतियां पापरूप हैं और अडसठ (६८) प्रकृतियां पुण्यरूप हैं पुद्गलविपाकी कही गयीं स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, की उत्तरभेदरूप वीस प्रकृतियां जीवको अनुकूल होनेसे पुण्यमें गिनी जाती हैं और अपने प्रतिकूल होनेसे पापोंमें परिगाणित हैं । काला रंग अच्छा है, बुरा भी है । तीर्थङ्कर महाराज भी कोई काले रंगके होते हैं । अधिक गोरापन भी बुरा है। काले नमकका रस किसीको अच्छा लगता है और किसीको बुरा । मूलीके पत्तोंमें या हींगडामें किसीको सुगन्ध आती है, दुसरेको दुर्गन्ध प्रतीत होती है। वात प्रकृतिवालेको उष्ण पदार्थ अच्छा लगता है, पित्त प्रकृतिवालेको नहीं । दांतवाले युवाको कठोर सुपारी अच्छी लगती है, पोपले वृद्धको नहीं आदि। अतः पुण्य पाप पदार्थीको भी पृथक् रूपसे तत्त्वों कहना चाहिये, इस प्रकार कोई कह रहा है। वह कहना प्रशंसनीय नहीं है, इस बातको श्रीविद्यानन्द आचार्य स्पष्टकर कहते हैं। पुण्यपापपदार्थों तु बंधास्रवविकल्पगौ । श्रद्धातव्यौ न भेदेन सप्तभ्योतिप्रसंगतः॥ ८॥ पुण्य, पाप ये पदार्थ तो बन्ध और आस्रव तत्त्वके भेदोंमे प्राप्त हो चुके हैं, अतः सात तत्त्वोंसे भिन्नपने करके श्रद्धा करने योग्य नहीं हैं। यदि प्रत्येक तत्त्वके प्रकारोंका भी श्रद्धान किया जावेगा तो अतिप्रसंग दोष होगा, अर्थात् जीवतत्त्वके भी संसारी और मुक्त तथा अजीवतत्त्वके भी पुद्गल, आकाश, आदि एवं संवरतत्त्वके गुप्ति, समिति, आदि विकल्पोंका भी श्रद्धान करना आवश्यक पड जावेगा जो कि तुमको भी इष्ट नहीं है । इस ढंगसे तो तत्त्वसंख्याकी इयत्ताका निर्णय करना ही अतिकठिन पडेगा। न हि पुण्यपापपदार्थों बंधव्यौ जीवाजीवबंधव्यवत्, नापि वन्धफलं सुखदुःखाद्यनुभवनात्मकनिर्जरावत् । · शंकाकारने पहिले कहा था कि पुण्य पाप पदार्थ बन्धने योग्य हैं, सो ऐसा नहीं है जैसे कि जीव ( संसारी ) और अजीव ( पांच वर्गणारूप पुद्गल ) बन्धने योग्य हैं। तथा पुद्गल द्रव्योंमें योग्यता मिलनेपर अनेक परमाणु और स्कन्ध परस्परमें बन्धने योग्य हैं। भावार्थ-जीव दूसरे जीवसे नहीं बन्धता है । पुद्गलका सजातीय अन्य पुद्गल द्रव्यसे बंध हो जाता है । जीवका सजातीय से बन्ध नहीं होता है, अतः जीव और पुद्गल जैसे बन्धते हैं, तैसे पुण्यपाप पदार्थ बन्धने योग्य सहीं है । जैनसिद्धांतके अनुसार सिद्धराशिसे अनन्तवें भाग और अभव्यराशिसे अनंतगुणी कार्मण वर्गणायें एक जीवके प्रतिक्षण बन्ध होने योग्य हैं। उनमें पहिले से ही कोई पुण्य, पाप भेद नहीं है।
SR No.090496
Book TitleTattvarthshlokavartikalankar Part 2
Original Sutra AuthorVidyanandacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherVardhaman Parshwanath Shastri
Publication Year1951
Total Pages674
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size21 MB
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