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________________ अष्टमोऽध्यायः [ ४७७ नरकेषु तीव्रशीतोष्णवेदनाकरेषु यन्निमित्तं दीर्घजीवनं भवति तन्नारकायुः । क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंसमशकादिविविधवेदनाविधेयीकृतेषु तिर्यक्षु यस्योदयाद्वसनं भवति तत्तैर्यग्योनमायुरवगन्तव्यम् । शारीरेण मानसेन च सुखदुःखेन समाकुलेषु मनुष्येषु यस्योदयाज्जन्म भवति तन्मानुषमायुरवसेयम् । शारीरेण मानसेन च सुखेन प्रायः समाविष्टेषु देवेषु यस्योदयाज्जन्म भवति तद्देवमायुरवबोद्धव्यम् । इदानीं व्याख्यातं चतुर्विधायुषोऽनन्तरमुद्दिष्टं यन्नामकर्म तस्योत्तरप्रकृतिसङ्कीर्तनार्थमाह मतिजातिशरीरांगोपांगनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगन्धवर्णानुपूाडगुरुलघूपघातपरघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वर शुभसूक्ष्मपर्याप्तिस्थिरादेययशः कीतिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ।।११॥ यस्य द्रव्यकर्मण उदयवशादात्मा भवान्तरं प्रत्यभिमुखो व्रज्यामास्कन्दति सा गतिरित्युच्यते । गम्यत इति गतिरिति व्युत्पत्तावपि रूढिवशात्कस्मिश्चिद्गतिविशेषे वर्तते गोशब्दवत् । इतरथा हि अन्नादि के अभाव में भी जीवन देखा जाता है इसलिये अन्नादि आयु के प्रधान कारण नहीं माने जाते । तीव्र शीत और उष्ण वेदनाओं के खानि स्वरूप नरकों में जिसके निमित्त से दीर्घ जीवन होता है वह नरकायु कर्म है । भूख, प्यास, शीत, उष्ण, दंशमशक आदि विविध वेदनाओं के स्थान स्वरूप तिर्यंचों में जिसके उदय से रहना पड़ता है वह तिर्यंच आयुकर्म है । शारीरिक मानसिक सुख और दुःखों से व्याप्त मनुष्यों में जिसके उदय से जन्म होता है वह मानुष आयु कर्म है । शारीरिक और मानसिक सुखों से प्रायः भरपूर भरे हुए देवों में जिसके उदय से जन्म होता है वह देवायू कर्म है। चार प्रकार की आयु का कथन हो चुका । उसके अनन्तर कहा गया जो नाम कर्म है उसके उत्तर प्रकृति भेद बतलाते हैं सूत्रार्थ-गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण, बन्धन, संघात, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, आनुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास, विहायोगति, प्रत्येक शरीर, त्रस, सुभग, सुस्वर, शुभ, सूक्ष्म, पर्याप्ति, स्थिर, आदेय, यशकीति तथा इनसे इतर अर्थात् प्रत्येक शरीर से लेकर यशःकीत्ति प्रकृति तक प्रतिपक्षी कर्म भी हैं, जैसे-साधारण, स्थावर, दुर्भग, दुःखर, अशुभ, बादर, अपर्याप्त, अस्थिर, अनादेय और अयशः कीर्ति । तथा अन्तिम तीर्थंकर प्रकृति ये सर्व भेद नाम कर्म के जानने। जिस द्रव्यकर्म के उदय से आत्मा भवान्तर के प्रति अभिमुख होकर गमन करता है वह गति कर्म है 'गम्यते इति गतिः' ऐसी व्युत्पत्ति करने पर भी रूढ़िवश किसी
SR No.090492
Book TitleTattvartha Vrutti
Original Sutra AuthorBhaskarnandi
AuthorJinmati Mata
PublisherPanchulal Jain
Publication Year
Total Pages628
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size18 MB
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