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________________ सूक्तिमुक्तावली व्याख्या-यः पुमान् कृतः सुकृते पुण्ये अभिलापो येन ईशः सन् अदत्त परकीयं किमपि वस्तु नादत्ते न गृह्णाति । तस्मिन् पुसि शुभश्रेणिः कल्याणपरम्परा वसति निवासं करोति । कस्मिन् केव कमले कलहंसीव यथा कमले कलहंसी वसति । तथा पुनस्तस्मात्पुरुषात् विपत्कष्ट दूरं व्रजति दूरे याति । कस्मात्केव अम्बरमणे सूर्या रजनीव यथा सूर्याद्रात्रि रे व्रजति तथा। पुनस्त्रिदिवशिषयोः स्वगापवर्गयो संक्ष्मीः श्री स्तं भजते सेवते के केव विनीत विद्य व यथा विद्या विनीतं विनयान्वितं पुरुषं विद्या भजति मागच्छति तथा ॥ ३४ ॥ अर्थ-की है पुण्य की बौछा जिसने ऐसा जो पुरुष किंचित मात्र भी बिना दिया हुआ ग्रहण नहीं करता है उसको कमल में कलहंसी के समान कल्याण की परम्परा प्राप्त होती है, सूर्यसे जैसे रात्रि दूर भागती है उसी प्रकार उससे विपत्ति दूर भाग जाती है, जैसे विद्या विनम्र पुरुष को प्राप्त होती है वैसे ही उसे स्वर्ग, मोक्ष की लक्ष्मी प्राप्त होती है ॥ ३४ ॥ व्यतिरेकेणाह शार्दू विक्रीडितछन्दः यन्निवर्तितकीर्तिधर्मनिधनं सर्वांगसां साधनं प्रोन्मीलद्वघबन्धनं विरचितक्लिष्टाशयोद्रोधनं । दोर्गत्यैकनिबन्धनं कृतसुगत्याश्लेषसंरोधनं प्रोत्साधनं जिघृक्षति न तद्धीमानदत्तं धनं ॥३॥
SR No.090482
Book TitleSuktimuktavali
Original Sutra AuthorSomprabhacharya
AuthorAjitsagarsuri
PublisherShanti Vir Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages155
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size2 MB
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