________________
५६]
[४,६
सुगन्धदशमीकथा धरम करम करें जिनवर ताणौ समकित पालै भवतार तो । जिनदास साह तिहा बसिए जिनदत्ता तेह नारि तो ॥६॥
तेह बेह कुरखे उपनाए सुगंध कुवरि सविचार तो ॥७॥ रूप सौभागे आगलिए शरीर सुगंध हुवौ चंग तो । माय बाप सुख उपनोए महोछच कियौ मनि रंग तो ॥८॥ असुभ करम फलै माता मुइए दुख उपनी तव घोर तो । हा हा सुंदरि रूबडीए धर्मवंती गुण थोर तो ॥९॥ सजन सयल मनि दुख धरेए जिनदत्त विन सविशाल तो । जिनदास साह संबोधियोए झणि दुख धरौ गुणमाल तो ॥१०॥ वलि पनि राणि सुंदरिए जिम घर वसइ तम्ह सार तो । बेटिय तम्ह तणी उछरेए चंस वाधह अपार तो ॥१२॥ तव साह बोलि मानियोए परनि नारि सविशाल तो । रूपिनि मारि नाम छे तेह तणोए सागरसाहनी बाल तो ॥१२॥ तेनिए बेटि जाइ रूवडिए शामा तेह तनो नाम तो । रूपिणि मोह करे अति घणोए तेह उपरि बहु मान तो ॥१३॥ सावकि पुत्री देखि करीप द्वेष करै अति घोर तो । वर्तु करावै अति घणुए कोप करै धन घोर तो ॥१४॥ बेटिए तणौ दुःख दियौए साह कहै तब बात तो । सुगंध कुवरि दुरबलि हुइए मलिण दिसइ तेह गात्र तो ॥१५॥ रूपिनि तब कोप चढोए बोली करकस वानि तो। वांदिए अनावौ तम्ह एहनीए जिम होइ सुख खानि तो ॥१६॥ तव साह बांदि ल्यावोए आनि निज घर सार तो । ते वांदि तिने वस करिए रूपिनि कठिन अधीर तो ॥१७॥ तब साह जुवौ रझौए चेटि सयरिसौ जानिजो । रंघन करइ बीजि स्वडिए जिमे बापे गुणवंत तो |१८|| तव सुख पामियोए बाप पुत्रि गुणवंत तो । देखी न सके ते पापिनिए कपट कर चलि चंग तो ॥१९॥ वेलु धालि धान माहे घनिए मीठ घालि बलि थोर तो। साह जिमवा बैसै निरमलोप दुल उपजै तव घोर तो ॥२०॥
१. यह पंक्ति तीनों प्रतियोंमें नहीं है। स प्रतिमें ११ वें पद्यको तीन पंक्तियोंका मानकर श्लोकोंका अनुक्रम ठीक कर लिया है।
२. तव घोधियोए, ३. बस नारि, ४, अब वतु, ५. स देखियोए, ६. स दूलि, ७. स काही अपार, ८. स बेटि, ९. स बलिवंत ।