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हिन्दी
इमि कहि वस्त्राभरण तें पूज करी मन लाय अरु सुर पुन ऐसे कही तुम मेरी वर माय ॥ १३५॥
चोपाई - श्रुति कर सुर निज थानकि गयो । लोकां इह निश्चय लखि लियो ||
धन्य सुगंधदशमि ब्रतसार | तब सबही जन यह व्रत धरयो । तिलकमती कंचनप्रभ राय । पात्रनिको शुभदान | शील सुभाय । पालनहार |
ताको फल है अनन्त अपार ॥ १३६ ॥ अपतुं कर्म महाफल हरयो || मुनिकुं नमि अपने घर जाय ||१३७|| करती जिनकी पूज अमान || अरु उपवास करें मन लाय ॥ १३८ ॥
पतिव्रत गुणकी
पुनि सुगंधदशमीव्रत धार ॥
अन्त समाधि थकी तजि प्रान
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जाय लयो ईशान सुधान || १३९॥
देती पालै दर्शन
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सागर दोय जहाँ तिथि लई नारीलिंग निद्य छेदियो ।
शुभ हैं भयो सुरोत्तम सही || चय शिव पासी जिनवर्णयो ॥ १४० ॥ निरमल चरम तहाँ शिर दरें || पूव पुन्य भये तित आन ॥ १४१ कीजे हो ! भदि शर्मं विचार ॥
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इह लखि सुगंध दीं व्रतसार ।
जे भवि नरनारी व्रत करें। ते संसार समुद्रस तरें ॥ १४२ ॥
जहाँ देव सेवा बहु करे । और विभव अधिको जिहिं जान
दोहा - श्रुतसागर ब्रह्मचारि को ले पूरव अनुसार ।
भाषा सार बनायके सुखित खुस्याल अपार || १४३॥
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