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________________ १४३ ] हिन्दी इमि कहि वस्त्राभरण तें पूज करी मन लाय अरु सुर पुन ऐसे कही तुम मेरी वर माय ॥ १३५॥ चोपाई - श्रुति कर सुर निज थानकि गयो । लोकां इह निश्चय लखि लियो || धन्य सुगंधदशमि ब्रतसार | तब सबही जन यह व्रत धरयो । तिलकमती कंचनप्रभ राय । पात्रनिको शुभदान | शील सुभाय । पालनहार | ताको फल है अनन्त अपार ॥ १३६ ॥ अपतुं कर्म महाफल हरयो || मुनिकुं नमि अपने घर जाय ||१३७|| करती जिनकी पूज अमान || अरु उपवास करें मन लाय ॥ १३८ ॥ पतिव्रत गुणकी पुनि सुगंधदशमीव्रत धार ॥ अन्त समाधि थकी तजि प्रान । जाय लयो ईशान सुधान || १३९॥ देती पालै दर्शन । सागर दोय जहाँ तिथि लई नारीलिंग निद्य छेदियो । शुभ हैं भयो सुरोत्तम सही || चय शिव पासी जिनवर्णयो ॥ १४० ॥ निरमल चरम तहाँ शिर दरें || पूव पुन्य भये तित आन ॥ १४१ कीजे हो ! भदि शर्मं विचार ॥ । इह लखि सुगंध दीं व्रतसार । जे भवि नरनारी व्रत करें। ते संसार समुद्रस तरें ॥ १४२ ॥ जहाँ देव सेवा बहु करे । और विभव अधिको जिहिं जान दोहा - श्रुतसागर ब्रह्मचारि को ले पूरव अनुसार । भाषा सार बनायके सुखित खुस्याल अपार || १४३॥ [=
SR No.090481
Book TitleSugandhdashmi Katha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1966
Total Pages185
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari, Story, & Biography
File Size5 MB
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