________________
११७]
हिन्दी
1
मात । नाचीं है तुम पै हरषात || देव । अंगी कीन्हू भूप स्वमेव || १०० ॥ बाय | लर्मचार तयार बुलाय || दोय । अब हीं करयो देर मत होय || १०१ || कंचनकार लागि गये घडने अधिकार || मनमोहि । रत्न जडित मूठ्यो अति सोहि ॥ १०२ ॥ मँगाय । डाना में परि चाल्यो राय ॥
I
इम सुणि तबहीं स्वर्णसक सबके घोडस भूषण और एक वेष उत्तम करि लयो । रजनी समय नारि ढिंग गयो । १०३ || रतन afsant कौर जु सार | सोमै सारीके अधिकार |
1
भूषण वेष दये नृप जाय । दोय बुहारी लखत सुहाय ॥ १०४ ॥ नारि चरण नृपके तब धोय । सिर केशनि तैं पूछिव होय || क्रीड़ा करि बहुते सुख पाय । प्रात भये नृप तौ घरि जाय || १०५ || तिलकमती अति हर्षित होय । जाय दई सु बुहारी दोय || और दिखाये भूषण वेष | माता देख्यो सार जु भेष || १०६ || मनमें दुःखित वचन इम कह्यो । तेरो भरता तस्कर भयो । राजाके भूषण अरु वेष | लाय दये तो कूँ जु अशेष ॥ १०७॥ हम सब कूँ दुःखदायी सोय । हम कहि खोसि लये दुखि होय || st दिलगीर भई अधिकाय । साँझ समै राजा जब आय ॥ १०८ ॥ राय तत्र संबोधी जोय | मन चिंता राखौ मति कोय ॥ और घणे ही देंहू लाय । इम सुणि तिलक्रमती सुख पाय || १०९ ॥ दीप थकी जिनदत्त जु आय। बंधुमती पति से बतराय || तिलकमती के अवगुण घणां । कहा कहूँ पति अथवा तणा ||१०|| ब्याह समै उठिगी किन थान । परण्यो चोर तहाँ सुख ठान | सो तस्कर भूपति कै जाय । भूषण वेष चोरि कर लाय ॥ १११ ॥ या छह दीने तब आय । खोसि रखे मो द्विगमें लाय || यह कहि वे सब भूषण सार । लाय घरे आगे भरतार ||११२ || सेठ देखि कंपित मन माहिं । तबहीं राज सुथानकि जाहिं ॥ घरे जाय राजाके पाय । सच विरतंत को सण राय ॥ ११३ ॥ को वेष भूषण तो आय । परि वह चोर आनिद्यो लाय ||
इहि विधि सेठ सुणी नृप बात । चाल्यो निज घरि कंपित गाल ॥ ११४ ॥
जुगल बुहारी मेरो यात ला दीज्यो तुम जब बैटो व
तिन तें कही बुहारी
साह सुतासू इह वच कियो | तें हमकूँ यह कुण दुख दियो || पति ॐ जाणे है अकि नाहि । को दीप बिनु जायूँ कांहि ||११५|| कचहूँ दीपक हेति सेठ कहै किस ही विधि जान । तिलकमती तत्र बहुरि बखान ||११६ || इक विधि करि मैं जानूँ तात्त । सो इह सुणो हमारी बात ।
सनेह | मोकू मम माता नहिं देह !!
1
-]