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________________ २] दोहा-भोग शर्म करती भई कन्या इक लखि माय । नाम धरयो तब मोह से तेजोमती सुभाय ॥६६॥ छन्द-प्यारी माता कूँ लागे । नहि तिलकमती V रागै ॥ नाना विध करि दुख द्यावै । ताके मनसा न विभावै ॥६७|| तब तात सुतासु निहारी। कन्या इह दुखित विचारी ।। दासी आदिक जे नारी । तिनसों इम सेठ उचारी ॥६८॥ याकी सेवा सुखकारी । कीज्यो तुम भक्ति विचारी ।। ऐसे सुणि ते सुख पावै । तब नीकी भाँति खिलावै ॥६९॥ चौपई–एक समय कंचन प्रभ राय । दीपांतर जिनदत्त पठाय || नारीसों तब भारी जाय । हम। राजा दीपि खिवाय ॥७॥ ताते एक सो तुम बात : इ. दो बगायो दरम्मत ! अष्ट गुणा जुत जो वर होय । इनको करि दीज्यो अवलोय ७१॥ इम कहि दीपि चल्यो तत्काल । और सुणों श्रेणिक भूपाल | आवै करन सगाई कोय । तिलकमती जाचै तब सोय ॥७२॥ बंधुमती मास्दै तब आय । यामें औगुण हैं अधिकाय ।। मम पुत्री गुणवंती घणी । रूप आदि शुभ लक्षण भरी ||७३ ॥ ताते मो कन्या शुभ जान । वर नक्षत्र व्याही तुम आन ॥ इनकी माने नाही बात ! तिलकमती जाचै शुभगात ॥७॥ कही फेरि यूँही मम सही । मनमें कपटाई धरि लई ।। व्याह समै कन्या मम सार | करदेस्यूँ ब्याहित तिहिं वार ||७॥ करी सगाई आनन्द होय ! च्याह समै आये तब सोय ।। बंधुमती फेस्याँकी बार । तिलकमती बहु भाँति सिंगार ॥७६।। घड़ी दोय रजनी जब गई । तिलकमती कूँ निज संगि लई ।। तबहिं मसाण भूमि मधि जाय । पुत्री . तिहि ठाणि बिठाय ॥७७॥ तहाँ दीप जोये शुम चार | पूरे तेल उद्योत अपार || चौगिरदा दीपक चइ धरे । मध्य तिलफमति थिरता करे ||७|| तिलकमती तूं भाखी तहाँ । तो भरता आवेगो इहाँ ।। ताहि विवाहि आवजे चाल 1 इम कहि करि चाली ततकाल ।।७९|| आधी रात गये तब राय । महल थके लखि वितरक लाय । देवसुता जखिनी वा कोय । ना जाने वा किन्नर होय ||२०|| कै इह नरी यहाँ क्यू आय । ऐसी विधि चितवन करि राय ।। हस्त खड्ग ले चाल्यो तहाँ । तिलकमती तिष्ठ थी जहाँ ।।८।। दोहा-जाय पूछियो रायजी तू क्रुण है इनि थानि । तिलकमती सुणिकै तचै ऐसी भाँति घस्वानि ।।८२।।
SR No.090481
Book TitleSugandhdashmi Katha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1966
Total Pages185
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari, Story, & Biography
File Size5 MB
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