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________________ सप्र० ४ ॥ को मुत्पति सचेतनः ॥ दीर्घसंसारबीजं हि विषवदुःखदायकम् । नानोद्रेककरं सौन्यमक्षजं विद्धि तरखतः ॥२०॥ नानादुःखकर तीन शान्त्यमृतपरामुखम् । भयैराकुलित नित्यं सौख्यं विद्धि तदक्षजम् ॥२८॥ आधिव्याधिकरं नित्यं दुःखसंतापदायकम् । संसारभ्रमणस्यैव कारणं सक्षजं सुखम् ॥२॥ बाप्राप्त मात्ररम्येऽस्मिन्नक्षजे दुःखदे सुखे । भयसंतापसंमिचे को मोहः स्वात्मदिनाम् ॥३०॥ मधुलिप्सासिधारावकिपाकवत्तक्षजम । श्रास्वादसे किमर्थ स्वमात्मन् सौख्यं भयावहम् ॥३१॥ त्वां वंचितं प्रवृत्तानीन्द्रियाणि रम्यभावतः। पातयित्वा भवाब्धौ त्वां दुःखं दास्यन्ति तश्वतः ॥३२॥ अक्षसौख्ये हि राग वा कुरु मा तत्वबोधतः । स्वात्मनः कुरु सयानं लमसे सौख्यमात्मजम् ॥३॥ इन्द्रियोट्रेकमारुध्य स्वमनः स्ववर्श मय । पश्यात्मनात्मनः सौख्यं स्वस्मिन ध्यानेन संततम् ||३४|| विषयेभ्यो निवर्तन्वे यदाज्ञारण सुख वास्तवमें दीर्घ-संसारके कारण हैं, निगरले समान दुःखदायक है और अनेक प्रकारकी उद्रेकताको उत्पम करनेवाले हैं ऐसा तू समझ ॥२७॥ ये इन्द्रियजन्य सुख अनेक प्रकारके दुःख देनेवाले हैं, अत्यन्त तीव्र १ शांतिरूपी अमृतको नष्ट करनेवाले हैं और भयसे सदा भरपूर रहते हैं। हे आत्मन् ! तू ऐसा समझ ॥२८॥ ये इंद्रियजन्य सुख अनेक प्रकारकी आधि-व्याधियों को उत्पन्न करनेवाले हैं, सदा दुःख और संतापको देनेवाले | | है और संसारपरिभ्रमणके कारण हैं । ॥२९॥ इन्द्रियजन्य सुख सेवन करते समय मनोहर जान पड़ते हैं, परंतु वास्तवमें दुःख देनेवाले हैं तथा भय और संतापसे भरपूर हैं; भला ऐसे इन इन्द्रियजन्य सुखोंमें आत्माके | स्वरूपको जाननेवाला जीव कैसे मोहित हो सकता है ? ॥३०॥ हे आत्मन् ! ये इन्द्रियजन्य सुख शहत लपेटी | तलवारकी धाराके समान अथवा किंपाकफलके समान अंतमें दुःख देनेवाले हैं तथा अत्यन्त मयानक हैं, ऐसे | इन सुखोंका आखादन तू क्यों करता है ? ॥३१॥ ये इंद्रियां अपनी मनोहरता धारणकर तुझे ठगनेके लिये प्रास हुई हैं, इसलिये तुझे इस संसाररूपी समुद्रमें गिरकर वास्तवमें महादुःख देंगी ॥३२॥ इसलिये हे आत्मन् ! तु आत्मज्ञानको धारण कर, इन इंद्रियजन्य सुखोंमें राग मत कर तथा आत्माका श्रेष्ठ ध्यान कर, जिससे कि तुझे आत्मसुखकी प्राप्ति हो ॥३३॥ हे आत्मन् ! तू इंद्रियोंके उडेकको रोककर अपने मनको fe अपने वश कर । तथा ध्यानके द्वारा तू अपनेही आत्मामें अपने आत्माके सुखको देख ॥३४॥ जब ये इन्द्रियां | आत्मज्ञानके द्वारा अपने विषयोंसे हट जायंगी, तभी तुझे ध्यानके द्वारा आकुलतारहित आत्मसुख दिखाई SAMRSARIHARIYANAYARS5458445K 3599435AHARART933
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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