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________________ सु० प्र० ॥ ८० ॥ ||१०० || आकिञ्चन्यं च निस्संगमात्मानं विश्वसन् यतिः । स व्यामोहकरं वस्त्र धत्ते मोक्षाय वा कथम् ॥ १०१ ॥ यागिनां शरीरेऽपि परं निःस्पृहता मता । श्रात्मैवात्र सुप देयोऽन्यत्सर्वं खलु ॥१०२॥ निर्ममत्वं शरीरे न यस्यास्ति स्वात्मभावतः । मोहात्म हि कथं धतेऽप्यमानं परिग्रहम् ||१०३ ॥ ममत्वं यैर्यतीर्वा त्यक्तं हि स्वतनौ ननु । ते संयम समाराध्य लभन्ते हि शिवं लघु ॥१४॥ यतो दिगम्बराणां स्यान्मोक्षो निर्ममतात्मनाम् । पंचामत्तत्रतं तेषां नान्येषां संगधारिणाम् ।। १०५ ।। हुस्ततो हि जैनेन्द्राः साक्षान्मोदस्य कारणम् । नग्नं दिगम्बरं लिङ्ग निसंग जातरूपकम् ॥१०६॥ जगति परमनिय पंचपाएं सैन्यं त्यजतु परमशुद्धया पंचवृतं सुधृत्य । निवसतु मुनिमार्ग वा यथा जातमुद्र इह धरण सुधर्ममात्मनो मोक्षरूपम् ॥११- ७ ।। इति सुधर्मध्यान्नप्रदीपालंकारे महातप्ररूपणो नाम मोऽधिकारः ॥ हृदयसे ममत्र दुर नहीं हुआ है, निर्ममता नहीं है, तो फिर महाव्रत धारण करनेसे ही क्या प्रयोजन निकल सकता है ? || १००|| जो मुनि इस आत्माको परिग्रहरहित अकिंचनस्वरूप श्रद्धान करता है, वह मोक्ष प्राप्त करने के लिये मोहित करनेवाले वस्त्रोंको भला कैसे धारणकर सकता है ? ॥१०१॥ योगी लोग अपने शरीर से भी निस्पृहता धारण करते हैं, क्योंकि योगीलोगोंके लिये आत्मा ही उपादेय है, बाकी सब हेय वा त्याग करने योग्य हैं || १०२ || जो मुनि आत्मीय भावोंके प्रगट होने से शरीर में भी निर्ममता धारण करता है, वह मोहसे उत्पन्न होनेवाले अणुमात्र परिग्रहको भी कैसे धारण कर सकता है १ ॥१०३॥ जिन मुनिराजोंने अपने शरीरसे भी ममत्व भावोंका त्याग कर दिया है, वे मुनि संयमका आराधन कर शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं || १०४ || क्योंकि यह नियम है कि निर्मम - त्वको धारण करनेवाले दिगम्बर मुनियोंको ही मोक्षकी प्राप्ति होती है । क्योंकि निर्ममत्व दिगम्बर मुनियोंके ही महाव्रत होते हैं, परिग्रह धारण करनेवाले अन्य किसीके महाव्रत नहीं हो सकते ॥ १०५ ॥ इसीलिये भगचान् जिनेन्द्रदेव बालकके समान परिग्रहरहित न दिगम्बर अवस्थाको मोक्षका साक्षात् कारण कहते हैं ॥ १०६ ॥ ये हिंसादिक पांचों पाप संसारभर में परम निन्द्य हैं और सेवन करनेके अयोग्य हैं। इसलिये मन, वचन और कायकी परम शुद्धिपूर्वक पांचों महावतोंको धारणकर इन पांचों पापका त्याग कर देना चाहिये, तथा बाल्य समयकी नममुद्राको धारण करनेवाले सुनिमार्ग में निवास करना चाहिये और मोक्षरूप आत्मा के श्रेष्ठ धर्मको धारण करना चाहिये ||१०७/१ यह मुनिराज श्री सुधर्म सागरप्रणीत सुधर्म ध्यानप्रवी पालंकार में महाव्रतोंको निरूपण करनेवाला यह आठवां अधिकार समाप्त हुआ।
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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