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________________ सुप्र० भा. ॥७ ॥ संगद्रपति संक्लेशो महारम्भप्रदायकः । चिन्ताशीकपरीताप वेदनाद्या भवन्ति वा ॥शा संगादेव भवेन्लोभो लोभापा प्रजायते । पापाद्भवति संसारो जन्मान्तकविधायकः || संगार्जने परं दुःखमधिकं रक्षणे तनः । देवेन संगनाशः स्यात्ततो दुःखं महत्तरम् ।।७।। कामक्रोधौ तथा हर्षभयलज्जादिदुर्गुणाः । से सर्वे चैकसंगेन जायन्ते क्लेशदायकाः । ॥७६॥ संगादेव पिता पुत्रं पुत्रों का पितरं निजम् । हन्ति इन्ति दहा लोके संगमोहो हि दुस्तरः ॥७७॥ संगमोहास्पतत्यग्नी संगमोहाच युध्यते । संगमोहात्स चैकाकी प्रविशन्दुर्गमे धने ॥८॥ करोति संगलाभेन कलह भंडन तथा । बधभङ्गादिच्छदं सरं वा शलरोपणम् ||६|| सालोभन सज्जागौरव यत्ति न क्वचित्। अस्पृश्यनीचलोकं हि सेवतेऽसौ सहर्षतः 10 संगलोभात्सदाचारं तुम्पत्येष कुशिक्षया । न भक्षयन्यथा हि प्रत्यक्षग्लानिकारकम् ।।१। मंगलोभेन सद्धर्म त्यजत्य. | और चिंता, शोक, परिताप, वेदना आदि मत्र परिग्रहसे ही उत्पन्न होते हैं ॥७३॥ इस परिग्रहसे लोभ बढ़ता है | लोभसे पाप उत्पन्न होता है आर पापसे जन्म-मरण उत्पन्न करनेवाला महासंसार बढ़ता है ।।७४ | | इस परिग्रहके उत्पन्न करनेमें महादुःख होता है, उसकी रक्षा करनेमें उससे भी अधिक दुःख होता है और | कदाचित् दैवयोगसे उस परिग्रहका नाश हो जाय तो सबसे अधिक दुःख होता है ॥७५॥ काम, क्रोध, ! हर्ष, भय और निर्लजता आदि जितने क्लेश उत्पन्न करनेवाले दुर्गुण हैं, वे सब इस परिग्रहसे ही उत्पन्न होते हैं । ७६॥ इस परिग्रहके कारण पिता पुत्रको मार डालता है और पुत्र पिताको मार डालना है। हा हा ! देखो, इस संसार में यह परिग्रह अनंत दुःख देनेवाला है ||७७॥ इस परिग्रहके ही मोहसे यह प्राणी अग्निमें जल मरता है, परिग्रहके ही मोहसे युद्ध में लड़ता है और परिग्रहके ही मोहसे अकेला दुर्गम बनोंमें प्रवेश करता है ॥७८। इस परिग्रहके ही लोभसे यह जीव कलह वा गाली गलौज करता है, ऋग्ताके साथ मारता | है वा शरीरका छेदन भेदन करता है और परिग्रहके ही लोभसे शूलीपर चढ़ता है ॥७९॥ इस परिग्रहके लोमसे ही यह जीव अपनी श्रेष्ठ जातिका गौरव नहीं समझता है और प्रसन्न होकर अम्पृश्य नीच लोगोंकी। किया करता है ॥८॥ इस परिग्रहके लोभसे ही सदाचारका लोप कर डालता है और कुशिक्षाके द्वारा प्रत्यक्ष म्लानि उत्पन्न करनेवाले अभक्ष्य पदार्थीका भक्षण करता है ।।८१॥ परिग्रहके लोभसे ही यह जीव | Kा मगवान जिनेन्द्रदेवके कहे हुए भेष्ठ धर्मको छोड़ देता है और मूर्खता धारणकर जिनागमके अर्थको मी
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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