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________________ सु० प्र० ॥ ७३ ॥ भूतले । दुःखशोकपरीतापविपत्तीनां मतं गृहम् ||३६|| एकतो मैथुनं पापं सर्वपापानि चान्यतः। तुलां कोटिं न विवन्ति गरीयस्तद्धि मैथुनम् ||३७|| श्वत्रादि दुर्गतेः स्थानं वा कलंकस्य भाजनम् । अपमानस्य बीजो हि तत्पापं मैथुनं मुबि ||३८|| सेवनाच्छो रोगाः सर्वे भवन्ति च । पराभवोऽय जीवानां तेन स्याद्धि पदे पदे ||३१|| धनधान्यसमृद्धीनां नाशो मैथुनपापतः । जीवस्य जायते शोधमयशः स्वादे परे ॥ स्वराशन्नि मातरम् | दाहा स्वस्त्रीवधं कृत्वाऽऽकांक्षत्येष पराङ्गनाम् ||४१|| ब्रह्मपापतो नूनं स्वात्महत्यां करोति वा । हा पापिनां विवेको न कृत्याकृत्यस्य भूतले ||४२ || ब्रह्मपातः शोध व्यसनानां समागमः । संपत्स्यते हि जीवानां संसारस्य च वर्द्धः ||४३|| तपोध्यानदद्यासत्य संयमादिकसद्गुणाः । ब्रह्मपापतो नूनं पलायन्वे हि लाघवात् ||४|| कामाग्निना हि मूढात्मा इस संसार में मैथुन सेवनके समान अन्य कोई निन्दनीय पाप नहीं है, यह पाप दुःख, शोक वा संताप और अनेक विपत्तियों का घर है ||३६|| यदि एक ओर मैथुन सेवनका पाप रख लिया जाय और दूसरी ओर अन्य समस्त पाप रख लिये जायं तो भी वे सब मैथुन सेवनकी समानता नहीं कर सकते । मैथुन सेवनका पाप उन सबसे भी अधिक होता है ||३७|| इस संसारमें यह मैथुन सेवनरूप पाप नरकादिक दुर्गतियों का स्थान है, कलंकका पात्र है और अपमानका कारण है ||३८|| इस मैथुन सेवन से समस्त रोग शीघ्र उत्पन्न हो जाते हैं और इसी के सेवनसे जीवों को पदपदपर तिरस्कार सहना पड़ता है ||३९|| इस मैथुन सेवनके पापसे इस जीवके धन, धान्य और समस्त संपदाओं का नाश हो जाता है और पद पदपर अपयश होता है ||४०|| इस मैथुन सेवन के पाप से मोहित होकर यह मनुष्य माताको मार डालता है और अपनी स्त्रीको मारकर परस्त्रीकी इच्छा करता है ||४१ || इस मैथुन सेवनके पापसे यह मनुष्य अपनी आत्महत्या भी कर लेता है। सो ठीक ही है, क्योंकि पापी जीव कृत्य अकृत्य आदिका कोई किसी प्रकारका विवेक नहीं करते हैं || ४२ ॥ इस अब सेवन के पाप से जीवों के जन्म-मरणरूप संसारको बढ़ाने वाला समस्त व्यसनों का सनागम बहुत शीघ्र हो जाता है ||४३|| तप, ध्यान, दया, सत्य और संयम आदि समस्त सद्गुण छन् अत्र सेवन के पापसे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ||४४|| कामरूप अप्रिसे जला हुआ यह सूर्ख पतंग के समान शोत्र ही भस्म हो जाता है, सो ठीक सु० ५० १० RBAR
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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