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________________ सु० प्र० ॥ ७१ ॥ 地 RRR दुर्गतिभाजनम् ||१७|| असत्यं नरकद्वारं सय आपत्तिकारकम् । मानभङ्गो भयः शोको जायतेऽसत्यवाक्यवः || १८ || सत्यं भयदं त्यक्त्वा चर सत्यं महाश्रतम् । सत्ये चैके स्थिताः सर्वे योगिनो व्रतपालकाः ||१६|| तस्मात्सर्वप्रयत्नेनासत्यं त्यज सुभावतः । सत्यवाक्यं वदात्मन् त्वं सुखदं दुःखहारकम् ||२०|| सत्यं महान्तं भक्त्या जिनेन्द्रैरिह धारितम् । मुनिभिर्योगिनाथैव धारितं शिवसिद्धये ||२१|| तस्माद्धारय हे आत्मन् सत्यमेव महाब्रतम् । महाव्रतप्रभावेन सुधर्मं लभते शिवम ||२२|| स्तेयं पापं महानिन्धं जीवानां दुःखदायकम् । स्थानं बंधयधादोनां विपत्तीनां गृहं मतम् ||२३|| नास्ति स्तेयसमं पापं परपीडाकरं नृणाम्। एकेन स्तेयपापेन जितं पापकदम्बकम् ||२४|| चौरस्य हि दया नास्ति आत्मघाताच नो भयम् । कृत्याकृत्यविवेको न न शल्यरहितं मनः ||२४|| धनमेव हि जीवानां प्राणाः सन्ति सुजीवने । उद्घृते च धृतास्तेन प्राणा: आत्मन् ! तू इन असत्य वचनोंको वास्तव में प्रत्यक्ष दुःख देनेवाले पाप समझ ये असत्य वचन क्लेश, TE और बंधन आदि स्थान हैं और दुर्गतिकै पात्र हैं ||१७|| यह असत्यरूप पाप नरकका द्वार है, शीघ्र ही अनेक आपत्तियों को लानेवाला है, तथा इसी असत्यके प्रतापसे मानभंग होता है, भय उत्पन्न होता है, और शोक प्रगट होता है ||१८|| इसलिये हे आत्मन् ! भय देनेवाले इस असत्यका सर्वथा त्याग कर और सत्य महाव्रतको धारण कर । व्रतको पालन करनेवाले समस्त योगी इस एक सत्य व्रतमें ही स्थिर रहते हैं ॥ १९ ॥ इसलिये हे आत्मन् ! तू अपने श्रेष्ठ परिणामोंसे और सतरहके प्रयत्नोंसे इस असत्यका त्याग कर और सुख देनेवाले तथा दुःखों को दूर करनेवाले सत्यवाक्यों को ही सदा भाषण कर ||२०|| इस सत्य महाव्रतको भगवान् जिनेन्द्रदेवने मी धारण किया है और मोक्ष प्राप्त करनेके लिये अनेक योगियों के स्वामियोंने और मुनिराजने धारण किया है ||२१|| इसलिये हे आत्मन् ! जिस सत्य महाव्रतके प्रभावसे सब तरहका कल्याण करनेवाला श्रेष्ठ धर्म प्राप्त होता है, उस सत्यमहाव्रतको तू अवश्य धारण कर ||२२|| इसीप्रकार चोरीरूप पान मी महानिन्दनीय है, जीवोंको दुःख देनेवाला है, बंध-बंधनका स्थान है और अनेक विपत्तियोंका घर है ||२३|| इस चोरीके समान मनुष्यको पीड़ा उत्पन्न करनेवाला अन्य कोई पाप नहीं है । एक चोरी पापसे ही अन्य समस्त पाप हार गये हैं ||२४|| चोरके हृदयमें कभी दया नहीं होती, आत्मघात करनेसे कभी उसको भय नहीं लगता, कृत्य और अकृत्यका कमी उसको विवेक नहीं होता और उसका मन कमी शल्परहित नहीं होता BR kh
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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