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________________ प्र० सन्ति वा ॥३४॥ दुष्टभावप्रभावाभ्यां खपरप्राणहिंसनम् । हिंस्यन्ते स्वपरमाणा वा हिंसा सा मता जिनैः ॥३५॥ एके. न्द्रियादिजीवानां मिध्यात्वादिकषायसः । प्राणानां द्रव्यभावानां हिंसास्यावयपरोपणम् ॥३६॥ हिंसा पापं महनियमस्ति दुःख. प्रदायकम् | सर्वपापेषु मुख्यं वाऽधर्मस्य मूलकारणम् ॥३७॥ पापमेकं हि हिंसैव नास्त्यन्यत्पापनामभाक् । मन्यानि सर्वपापानि हिंसास्वन्तर्गतानि वा !॥३८॥ हिंसक नरकद्वारं हिंसव दुर्गतः स्थलम् । अज्ञानमस्ति हिंसैव हिंसाऽधर्मस्य कारणम् ॥३॥ अधर्मोस्त्यत्र हिसैव हिंसैव दुर्णयार्णवः। हिंसैव घोरमझानं हिंसैव भवबीजकम् ॥४०॥ सा हिंसैव मूषावादः हिंसैव परपीडनम् । अनीतेरसदाचारस्य हिसैव सुहाटकम् ।।४।। हिंसैव मोक्षमार्गस्य रोधिका चार्गला मवा । हिसैव दशधर्माणा मेदिका दुरिका मता ॥४२॥ लोकेऽस्मिन् व्यसनानां हि पातकानां कुकर्मणाम् । दुर्नीविकुचरित्राणां मूलं हिंसैव भाषिता ।।४।। | सर्वेषामस्त्यनर्थानां बधादिकलाहात्मनाम् । विश्वविध्वंसकानां हि हिंसव मुख्यसाविका ॥४४॥ वीर्घसंसारबन्धस्य हिंसैको II कहते हैं; अथवा जहाँपर अपने वा दूसरेके पापोंकी हिंया की जाती है भगवान जिनेन्द्देन उसको मी हिंसा कहते Kा हैं ॥३५॥ मिथ्यात्व आदि कषायके निमित्तसे एकेन्द्रिय दोइंद्रिय आदि जीवोंके द्रव्यप्राण वा भावप्राणोंका वियोग करना हिंसा कहलाती है ॥३६॥ यह हिंसारूप पाप महानिंद्य है, अनेक दुःख देनेवाला है, समस्त पापोंमें मुख्य है और अधर्मका मूल कारण है ॥३७॥ इस संसारमें एक हिंसा ही पाप है, हिंसाके सिवाय और S|| कोई पाप नहीं है, मिथ्याभाषण चोरी आदि अन्य जितने पाप है, ये सब इसी हिंसामें ही अन्तर्गत होते हैं | ASI ||३८॥ यह हिंसारूप पाप ही नरकका द्वार है, हिंसा ही दुर्गतिका स्थान है, हिंसा ही अज्ञान है और हिंसा | | ही अधर्मका कारण है ॥३९॥ यह हिंसा ही अधर्म है, हिंसा ही कुटिल नीतियोंका समुद्र है, हिंसा ही घोर S! अज्ञान है और हिंसा ही जन्म-मरणरूप संसारका कारण है ॥४०॥ वह हिंसा ही असत्यभाषण है, हिंसा ही Pा अन्य जीवोंको पीड़ा देनेवाली है और यह हिंसा ही अनीति तथा असदाचारकी दुकान है ॥४१॥ यह हिंसा ा ही मोक्षमार्गको रोकनेवाला अर्मल वा बेड़ा है आर उत्तम क्षमादिक दश धर्मोकी नाश करनेके लिये यह PH हिंसा ही छुरीके समान है ॥४२॥ यह हिंसा ही समस्त व्यसनोंका, समस्त पापोंका, समस्त कुकर्मोंका, - समस्त अनीतियोंका और समस्त कुचारित्रोंका मूल कारण है ॥४३॥ संसारके समस्त जीवोंका घात करनेवाली l हिंसा कलह और समस्त अनर्थोंका मूल साधन इस हिंसाको ही समझना चाहिये ॥४४॥ दीर्घ संसारके
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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