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________________ सु० प्र० ॥ ६२ ॥ कोलोभकषायास्ते जायन्ति व्रतधाततः । तैविमुह्यति चात्माऽसी न्याये धर्मविघातके ||२६|| पंचपापवशेनात्र आरम्भ विश्वघातकम् । संतनोति हि जीवोयं विवेकविकलः स्वयम् ॥२७॥ पंचपापचयेनात्मा समुद्रमवगाहते । अग्नौ पतति निःशङ्को भीमं युद्ध ं करोति सः ||२८|| पंचपापैर्हि जीवस्य बुद्धिर्धर्मा पलायते । श्रधर्मे दुःख भीमे बुद्धिः स्याच्च स्वतः सदा ॥२॥ पंचपापाहता बुद्धिः प्रेर्यमाणापि चोत्तमे । कार्य कदापि न स्यात्सा कुकार्ये स्यात्स्वतः स्वयम् ||३०|| हिंसादीनीह पापानि पंच सन्ति जिनागमे । तेषां विशेष विस्तारः स्यादनेकविकल्पतः ||३१|| त्याज्यानि तानि पापानि महाधरेण हि । जिनागमप्रमाणेन चतिना सुखलिप्सया ||३२|| श्राय हिंसा महत्पापं ततोऽसत्यप्रभाषणम् । अदत्तग्रहणं चैव तुर्यमब्रह्मसेवनम् ||३३|| अतिलोभान्ममत्वं च परद्रव्येऽभिमूर्च्छनम्। संगस्य संप्रज्ञे बाथ पंच पापानि आदि कषायें जागृत हो जाती हैं और उन कषायोंके कारण यह जीव धर्मको घात करनेवाले अन्याय मार्ग में जाकर मोहित हो जाता है ||२६|| इन पांचों पार्थोके परवश होकर ही यह जीव विवेकको छोड़कर संसारके समस्त प्राणियोंकी हिंसा करनेवाले आरंभोंको स्वयं प्रारंभ करता है ||२७|| इन पांचों पापके वश होकर ही यह आत्मा समुद्र में गिर पड़ता है, अग्निमें जल मरता है और निःशंक होकर भयानक युद्ध करता है ||२८|| इन पांच पापके ही कारण इन जीवोंकी बुद्धि धर्मसे हट जाती है और दुःख देनेवाले भयानक अधर्म सदा लिये स्वयं लग जाती है ||२९|| इन पांचों पार्षोंके कारण जो बुद्धि नष्ट हो जाती है, वह उत्तम कार्योंमें प्रेरणा करनेपर भी कमी नहीं जाती और पापरूप कार्यों में अपने आप चली जाती है ॥ ३० ॥ इन जैनशास्त्रोंमें "हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह" ये पांच पाप माने गये हैं। और इनके अनेक मेद होनेके कारण इनका बहुत विस्तार हो जाता है ||३१|| इसलिये महाव्रत धारण करनेवाले यतियोंको आत्मसुखकी इच्छा करते हुए जैनशास्त्रोंकी आज्ञा के अनुसार इन समस्त पापोंका त्याग कर देना चाहिये ||३२|| सबसे पहला महापाप हिंसा है, दूसरा पाप असत्यभाषण है, तीसरा पाप बिना दिये हुए पदार्थों का ग्रहण कर लेना वा चोरी करना है, चौथा पाप असेवन वा ब्रह्मचर्य का पालन न करना है और पांचवा पाप अत्यन्त लोभसे ममत्वपरिणाम रखना, परद्रव्योंमें ममत्वपरिणाम रखना अथवा अनेक परिग्रहों का संग्रह करना है । इसप्रकार ये पांच पाए हैं ||३३ -- ३४|| अशुभ परिणामोंसे अथवा प्रमादसे जहांपर अपने वा दूसरे प्राणोंकी हिंसा होती है, उसको हिंसा SKYPKV2 भा ॥६
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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