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________________ मु०प्र० 41३०॥ सत्यमहानवम् ॥1॥ प्रयोजनवशेनापि रागादिमनसाथवा। असत्यं सर्वथा त्याज्यं महाव्रतविशुद्धये ॥१॥ रागोद्रका प्रमादाद्वा परद्रव्यं न गृह्यते । अदत्तं श्रमणायोग्य तदचौर्य महाव्रतम् ॥६॥ तृणादिकं हि यत्किंचित्परस्य स्वप्रयोजनात् । | अदत्तं सर्वथा त्याज्यं तत्तृतीयं महानतम् ।।१२नवकोटिविशुद्धयः हि यदवझविवर्जनम् । रागो कारप्रमादाद्वा स्त्रीमात्रस्याप्यसेवनम् ॥११॥ परब्रह्मण्यवस्थानं तद्वि ब्रह्ममहानतम् । जगपूतं परं श्रेष्ठं ध्यानसिद्धिदिवाकरम् ॥१२॥ बाह्याभ्यन्तरसंगस्य नवकोटिविशुद्धितः । सर्वथा वर्जन ताद्ध मुरिहितचेतसा ॥१३॥ निस्संगदर्शनं ज्ञेयं पंचमं च महानतम् । गृहं वस्त्रं धन' दारास्त्यज्यन्ते यत्र भावतः ॥१४॥ मिध्यान्वहास्यकोपाद्याः दुर्भावाश्च विशेषतः । पंचमं तब्रतं झयं निःशल्यव्रतमुत्तमम ॥१५॥ प्रारम्भत्यागहेत्वर्थ वैराग्यध्यानसिद्धये . महाव्रतं मुनिर्धत्ते संयमार्थं च शुद्धधीः | होकर असत्यका त्याग कर देना है, उसको सत्य महावत कहते हैं ॥७॥ महायतों शुद्ध रखने के लिये किसी | प्रयोजनके वासे अथवा रागद्वेषपूर्वक मनसे भी कभी असत्यभाषण नहीं करना चाहिये, असत्यका सर्वथा Bा त्यागकर देना चाहिये ॥८॥ रागद्वेपके उद्रे कसे अथवा प्रमादसे मुनियों के अयोग्य ऐसे बिना दिये हुये किसी भी पर द्रव्यको ग्रहण नहीं करना अचौर्य महावत कहलाता है ॥९।। अपने किसी भी प्रपोजनसे दूसरेका तृण | आदि पदार्थ भी बिना दिया हुआ नहीं ग्रहण करना चाहिये । विना दिये सब तरहके पदार्थोंका त्याग करना तीसरा अचौर्य महाव्रत है ॥१०॥ मन, वचन, काय और कृत-कारितानुमोदनाके मेदसे नौ प्रकारकी विशुद्धतासे अब्रह्मका त्यागकर देना रागके उद्रेकसे अथवा प्रमादसे स्त्रीमात्रका सेवन नहीं करना तथा अपने आत्माको परमब्रम परमात्मामें लीन कर देना ब्रह्मचर्य महावत कहलाता है । यह ब्रह्मचर्य महाव्रत संसारभरमें पवित्र है, सबसे श्रेष्ठ वत है और ध्यानकी सिद्धि के लिये सूर्यके समान है ॥११-१२॥ अपने हृदयसे सब तरह के ममत्वका त्यागकर मन, वचन, काय और कृतकारित अनुमोदनाकी शुद्धिपूर्वक बाह्य-अभ्यंतरके भेदसे सब | तरहके परिग्रहोंका त्यागकर देना वह निथ अवस्थाको धारण करनेवाला पांचवां परिग्रहत्याग महावत | कहलाता है । इस परिग्रह त्याग महाव्रतमें घर, वस्त्र, धन और स्त्री आदि सवका भावपूर्वक त्याग किया जाता है तथा मिथ्यात्व, हास्य, क्रोध, मान, माया और लोभ आदि अशुभभावोंका विशेषकर त्याग किया जाता है, इस41 प्रकार समस्त शल्योंको दूर करनेवाला यह पांचवां परिग्रहत्याग महाव्रत कइलाता है ॥१३-१५॥ शुद्ध बुद्धिको
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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