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________________ पुत्रदारा न बांधवाः। जगद्वाराद् यमाल्लोक प्रकृष्टैः कोटियनकैः ॥१५॥ मण्योपधिसुमंत्राणि समर्थानि न रक्षितुम् । | यमाजीवं परं तानि वा यमस्याऽहता गतिः ॥१६॥ सुरासुरनरेन्दास्ते त्रैलोक्ये क्षयशक्तिकाः । रक्षितु वा समर्था ने यमपाशाच जन्तुकम् ॥१७॥ सर्वतंत्रा स्वतंत्रा ये चेन्द्राद्याः स्वर्गनायकाः। कालेनैकेन ते सर्व मारिता दृष्टमात्रतः ॥१८॥ अन्येषां का कया तत्र शरणं कस्य कोथवा । कर्म प्रबद्धजन्तूनां हाहा रहा कथं भवेत् ॥३था अनादिकालवो कोपि बली जीवं हि रक्षितुम् । यमानात्र शरण्योभून् रक्षेत्ः कर्मोनयेऽत्र कः ॥२०॥ धर्म एव शरण्यो हि जिनोतः सदयोथवा । यम विजित्य यः शीघ्र जीवं धरति सत्सुखे ॥२१॥ धर्म एवं पिता लोके शरण्यो रक्षको मतः। विपत्ती संकटे घोरे दुःखाकान्तशरीरिणाम् ॥२२॥ अशरणं ततःसर्व राज्यपुत्रकलत्रकम् । ज्ञात्वा च तत्त्वभावेन धर्ममाचर रचकम् ॥२३॥ जिनधर्म--- --- ---- ---- व मिल सकती, उसीप्रकार जब यह मृत्यु जीवको पकड़ लेती है तब इसको कोई शरण नहीं होता ॥१४|| इस संसारमें तीनों लोकोंमें एक शूरवीर यमराजसे व वाने के लिये करोड़ों उत्तमोत्तम प्रयत्न करनेपर मी पुत्र स्त्री बांधव आदि कोई समर्थ नहीं हो सकते ॥१५।। मणि, औषध और मन्त्र आदि कोई भी पदार्थ इस जीवको यमराजसे रक्षा करनेके लिये समर्थ नहीं हो सकते । यमराजकी गति किसीसे रोकी नहीं जा सकती ॥१६॥ | Lil सुर, असुर, चक्रवर्ती आदि जो महायुरूप तीनों लोकों अक्षय शक्तिको धारण करनेवाले हैं । वे भी यमराजसे | इस जीवकी रक्षा नहीं कर सकते ॥१४॥ स्वगों के स्वामी इन्द्र आदि सर्वोत्कृष्ट देव सब प्रकारसे स्वतन्त्र हैं, परंतु इस कालके द्वारा देखते देखते वे भी सब मृत्युको प्राप्त हो चुके हैं ॥१८॥ फिर भला अन्य जीवोंकी तो बात ही क्या है ? इस संसारमें कौन किसकी रक्षा कर सकता है ? जो जीव कर्मसे बंधे हुए हैं, उनकी रक्षा मला कैसे हो सकती है? ॥१९॥ इस संसारमें कोई भी बलवान पुरुष अनादि कालसे यमराजसे इस जीवकी रक्षा नहीं कर सका है । कर्मों का उदय होनेपर न तो कोई किसीकी रक्षा कर सकता है और न कोई किसीको शरणमें रख सकता है ॥२०॥ इस संसारमें भगवान जिनेन्द्रदेवका कहा ह दयामय धर्म ही शरण है। यह धर्म ही यमराजको शीघ्र जीत लेता है और जीवको उससे बचाकर मोक्षके श्रेष्ठ सुखमें पहुँचा देता है ।।२१॥ इस संसारमें अनेक दुःखोंसे आक्रांत हुए इन जीवोंको घोर विपत्ति और संकटके समयमें धर्म ही पिता है, धर्मही शरण है और धर्म ही सवका रक्षक है ॥२२॥ इसलिये इस जीवको स्त्री, पुत्र, राज्य आदि कोई मी शरण ॥
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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