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________________ FAKIS मा ॥ ३२ ॥ स्वरूपोसि देहातीतोसि वा उत ॥११७॥ आत्मन् चिंवय सोह वा सोहमिति निरन्तरम् । अभ्यासं कुरु नित्यं त्वं स्वस्पेन मनसा स्वयम् ॥११८॥ एवं विचार्यमाणेन बुद्धिः स्यात्परमात्मनि । म्वात्मनि स्वात्मना स्यैर्य मनो याति न संशयः ॥११॥ चिदा. स्मास्ति च यः शुद्धःमः शिखामेश्वरीसिनः सानिमोमिति चिन्तय सन्ततम् ।।१२०॥ सुचिन्तयन्निदं | चारमा स्वात्मनि कुरुते स्थितिम् । सम्यक्त्वमुत्तमं धृत्वा चिदानन्दमुपैति सः ॥१२१|| भावभुतेन संज्ञाप्य स्वात्मानं देह संस्थितम् । स्थिति स्वात्मनि यः कुर्यात्स स्याच्छुद्धोपयोगभाक् ॥१२२|| पारध्यते हि चात्मानमन्तई प्या स्वके स्वयम् । तदा स लभते शीध्र परमात्मानमव्ययम् ॥१२३।। सुनिजात्मानमाराध्यात्मात्मना स्वात्मनि स्वयम् । भवति परमात्मायमीश्वरः कर्महारकः ॥१२४ा एवं हि चान्तरात्मासौ भ्रमं त्यक्त्वा निजात्मनि । स्थापयति निजात्मानं सम्यक्त्वेन विशुद्धधीः ॥१२॥ | ही आत्मामें अपने आत्माको देख, फिर तुझे मालूम होगा कि तू शरीररूप है अथवा शरीरहित है ॥११॥ | हे आत्मन् ! "मैं वही परमात्मा हूँ वही परमात्मा हूँ" ऐमा निरंतर चिन्तवन कर । तथा स्वस्थ मनसे स्वयं ऐसे | चिन्तवन करनेका अभ्यास कर ॥२१८॥ इसप्रकार विचार करनेसे अपनी बुद्धि परमात्मामें लग जाती है और | यह मन अपने आत्माके द्वारा अपने ही आत्मामें स्थिर होजाता है इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है॥११९॥ | जो शुद्ध चिदात्मा है अथवा सिद्धारमा ईश्वर है वही मैं हूँ मैं उस सिद्धात्मासे भिम नहीं हूँ, हे आत्मन् ! इस| प्रकार तू बार बार चितवन कर ॥१२०॥ इसप्रकार चितवन करनेसे यह आत्मा अपने आत्मामें ही स्थिर हो जाता है और उत्तम सम्बग्दर्शनको धारणकर चिदानन्द अवस्थाको प्राप्त हो जाता है ॥१२१।। जो आत्मा अपने भावभुत ज्ञानसे शरीरमें रहनेवाले अपने आत्माको समझ लेता है और फिर अपने आत्मामें ही स्थिर हो जाता है वह आत्मा शुद्धोपयोगको धारण करनेवाला शुद्ध हो जाता है ॥१२२।। जो जीव अपने अतरंगसे | अपने ही आत्मामें स्वयं अपने आत्माका आगधन करता है वह कमी नाश नहीं होनेवाले परमात्माको बहुत शीघ्र प्राप्त हो जाता है।।१२३।। यह आत्मा अपनेही आत्माके द्वारा अपनीही आरमामें स्वयं अपने आत्माका आराधन |कर काँको नाश करनेवाला परमात्मा ईश्वर बन जाता है ॥१२४॥ इसप्रकार विशुद्ध बुद्धिको धारण करनेवाला यह अन्तरात्मा अपने प्रमको छोड़कर सम्यग्दर्शनके साथ साथ अपने आत्माको अपनेही आत्मा स्थापन H MIRRISHCHIMNS : RRARY
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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