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________________ AURREYLE ॥२६॥ निवेशय । स्वसंवेदेन चात्मानं भ्रमो स्वतः पलायते || जिनागमस्य सुभद्धा ढां कृत्वा मुभावतः। विचारय निजात्मानं भ्रमः नश्यति ते ततः ॥१०॥ जिनागमप्रसादेन कल्याणं ते भविष्यति । पश्यसि त्वं हि चात्मानं निर्लेपं स्वशरीरतः ।।३.१॥ निर्लेपं वेत्ति तत्पन' यारिस्थमपि वा जलात । अन्तरात्मा तथा पेत्ति चात्मानं देइतः पृथक् ॥२॥ अंतर्दृष्टया प्रमध्यंत दभः सर्पिः प्रसज्यते । अन्तरष्टया स्वकं ध्यायेत्परमात्माप्युदध्यति ॥६॥ उपेक्ष्य बहिरात्मानमन्तरास्मा भव त्वकम् । अभ्यन्तरे स्वमात्मानं पश्य पश्य निरन्तरम् ||६४॥ देहाविष्टोपि रे आत्मन्नन्तानबलेन हि । पश्य पश्य निजात्मानं स्वात्मन्येवात्र शुक् ॥५॥ देहाविष्टोपि शुद्धात्मा चिन्तयति पुनः पुनः । विशुद्धरूपमात्मानं द्वन्द्वातीनं मनोहरम् । द्वैतभावं निराकृस्य पश्यात्मन् पश्य तं सदा । विशुद्धरूपसम्पन्नं परात्मानं हि चात्मनि ॥६॥ यः परात्मा स एवाह परं तत्वं तदप्यम् । अहमेव परात्मास्मि सोई सोहमहं हिसः ॥८॥ श्रारमा हि परमात्मास्ति नान्यो भिन्नो नवा पृथक । F/ स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ।।८८॥ हे आत्मन् ? तु अपने स्वसंवेदन ज्ञानसे अपने आत्माको चिदानंदमय शुद्ध | व आत्मामें लीन कर, तभी तेरा भ्रम नष्ट होगा ॥८९॥ हे आत्मन् ! तू अपने परिणामोंसे जिनागमका दृढ़ | अद्धान करता हुआ अपने आत्माका चिंतन कर । इसीसे तेरा सब भ्रम नष्ट हो जायमा ।:९०॥ हे आत्मन् ! जिनागमके प्रसादसे ही तेरा कल्याण होगा और शरीरसे सर्वथा भिन्न अपने आत्माको तू अवश्य | देखेगा ॥९१॥ जिसप्रकार तू जलमें रहनेवाले कमलको जलसे सर्वथा भिन्न मानता है उसीप्रकार यह अंतरात्मा इस अपने आत्माको शरीरसे सर्वथा भिन्न मानता है ॥९२॥ जिसप्रकार अंतर्दृष्टिले मथनेपर दहीसे * घी निकल आता है उसीप्रकार अंतरेष्टिसे अपने आत्माका ध्यान करनेपर परमात्म अवस्थाकी प्राप्ति हो जाती | है ॥९३। इसलिये पहिरात्म अवस्थाकी उपेक्षाकर तू अंतरात्मा बन और अपने आत्मामें निरंतर अपने [ आत्माको देख ॥९४॥ हे शुद्ध सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले आनन ! अपने शरीरमें रहता हआ मीत अंतर्ज्ञानके चलसे अपने ही आत्मामें अपने आत्मा को देख ॥९५॥ शरीरमें रहता हुआ मी शुद्ध आत्मा समस्त उपद्रवोंसे रहित और अत्यंत मनोहर ऐसे अपने विशुद्ध आत्माको बार बार चितवन करता है ॥१६॥ हे आत्मन् ! तू द्वैतभावको छोड़कर अपने ही आत्मामें अत्यंत विशुद्धताको धारण करनेवाले अपने श्रेष्ठ आत्मा| को देख और सदा उसे ही देखता रह ॥९७।। जो परमात्मा है सो ही मैं हूं, जो परम तय है वहीं मैं हूँ, मैं
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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