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________________ सुप्र० ॥२८॥ सद्बोधः स च जाग्रति IRolt यदा यदा हि साधोः स्यान्मनो मोहपराकमुखम् । द्वन्द्वातीतं भ्रमातीतं स्वं प्राप्नोति तदेव तम् |शा मोहादून्धो हि जीवस्य विमोहालकमनिर्जरा । माही भ्रमति संसारे विमोही लभते शिवम् HAI तस्मात्सर्व प्रकारेण मोहभावं निवारय । कृत्वा जिनागमे श्रद्धां गृहीचा बोधमुत्तमम् ॥३॥ प्रतिहत्य महामोहभ्रम हि तिमिरावृतम् । स्वानुभूत्यात्मबोधेन स्वात्मानं पश्य निर्मलम् ॥८॥ अज्ञानजनितां चेष्ठां जिनोक्तस्वचिंतया । निवारय भ्रम शीघ्रं मिथ्यात्ववासनायुतम् ॥५॥ सत्यात्मक जिनेन्द्रो धर्म चिन्तय भावतः। चिन्तं तस्मिन् स्थिरं कृत्वा भ्रममात्मन निवारय ॥८६॥ जिनाज्ञां शुद्धभावेन धारयात्मन हद हदम् । तया मोहनमो नूनं स्वयं खत्तः पलायते ||॥ चितया. स्मन जिनोक्तं हि तत्त्वं भवेन निर्मलम् । भ्रमा हिनश्यते तस्मात्स्वस्वरूपं प्रपधसे || चिदानन्दमये शुद्ध निवेशय मू के कारण सो जाता है वह विपयादिकों में ही आकर लोला है जो मोह और पूछो छोड़कर सम्यग्ज्ञानी | हो जाता है उसे ही इस संसारमें जगनेवाला समझना चाहिये ।।८०|| जब जब साधुका मन मोहसे पास हो जाता है और सर्व उपद्रवोंसे रहित तथा भ्रमरहित हो जाता है तभी यह जीव अपने आस्माको प्राप्त | हो जाता है ॥८१।। इस जीवके मोह करनेसे कर्मों का बन्ध होता है और मोहका त्याग कर देनेसे कर्मोकी | निर्जरा होती है। मोह करनेवाला जीव इस संसाग्में परिभ्रमण करता है और मोहरहित जीव मोक्षको प्राप्त होता है ॥८२। इसलिये हे आत्मन् ! तू जैन आगमपर श्रद्धा रखकर और सम्यग्ज्ञानको प्राप्तकर सर तरहसे मोहका त्याग कर १८३॥ हे आत्मन् ! तू अंधकारसे घिरे हुए महामोहरूपी भ्रमको नाशकर स्वानुभूति और आत्मज्ञानसे अपने निर्मल आत्माको देख ॥८॥ हे आत्मन् ! तू भगवान् जिनेन्द्र देवके कहे हुए तत्वोंका | चितवनकर अज्ञान जनित चेष्टाका त्यागकर और मिथ्यात्वकी वासनासे भरे हुए भ्रम को शीघ्रही दूर | कर ८५॥ हे आत्मन् ! तु भगवान् जिनेन्द्रदेवके कहे हुए सत्यस्वरूप धर्मको शुभ परिणामोंसे ग्रहण कर और उसी धर्ममें अपना चिन लगाकर अपने भ्रमको दूर कर ॥८६॥ हे आत्मन् ! तू अपने शुद्ध मावोंसे भगवान् जिनेन्द्रदेवकी आज्ञाको दृढ़ताके साथ धारण कर, क्योंकि भगवान् जिनेन्द्रदेवकी आज्ञासे यह मोहलपी भ्रम अपने आप तुझसे भाग जायगा ।।८७॥ हे आत्मन् ! तू अपने परिणामोंसे भगवान् जिनेन्द्रदेवके कहे हुए II निर्मल तच्चोंका चितवन कर. क्योंकि तोंके चितवन करनेसे भ्रमका नाश हो जाता है और तू अपने आत्म
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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