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PRASAMICRORISM
विज्ञानरहितस्य जनस्य च । कर्मक्षयकरं ध्यान स्याकिं वा कर्मक्रंदनम् ॥१॥ भेदाभेद न जानाति कृत्याकत्यं न देति वा । ध्यानवैराग्यसंपत्तिस्तस्पात्र वञ्चिका भवेत् ।।८।। अकृत्य मन्यते कृत्यं कृत्यं त्यजति मोहतः | धर्माधर्म न जानाति ध्यानं सोऽत्र करोति किम् ॥३॥ दयो धत्ते न चितेषु न वेसि जीवलक्षणम् । अन्तस्तत्त्वविहीनो यः स ध्यानी स्यात्कर्ष ननु ॥१०॥ आत्मतत्त्वानभिज्ञानां बाह्मव्यावृप्तचेतसाम् । न स्यात्स्वात्मन्यवस्थानं ध्यानं तेषां जडात्मनाम् ॥११॥ यतीन ते धृथकर समया देहवहिनौ । सन्तोह मोहसरतेन ध्यायन्ति से परं परम् ॥१२॥ आत्मध्यानस्य लामो हि षो स्याच कदापि न । सशरीरास्मनोदविज्ञानेन भवत्यसौ ॥१शा प्रागेव चात्मविज्ञानं कर्तव्यं च मुमुक्षुभिः । ध्येयस्य निश्चयाभावे न स्याद् ध्यान सुनिश्चितम् ।।१४।। ध्येयः प्रात्मैव स त्रेधा अहिरन्तः परम्तथा । घ्यावाम्टोस्ति परो ध्येयो ज्ञान नहीं है उसका ध्यान कर्मोको नाश करनेवाला होता है अथवा कर्मोका संग्रह करनेवाला होता है ? मावार्थ यह है कि उसका ध्यान कर्मोका संग्रह करनेवाला ही होता है ।।७॥ जो पुरुष भेद अमेदको नहीं जानता, ] आत्मा और शरीरमें मेद नहीं समझता और न कृत्य अकृत्यको जानता है उसके लिये ध्यान और वैराग्य
की संपदा ठगनेवाली ही होती है ॥८॥ जो पुरुष अकृत्यको कृत्य मान लेता है और मोहनीय कर्मके उदयसे कृत्यको छोड़ देता है तथा इसीलिये जो धर्मध्यानको जान भी नहीं सकता वह भला ध्यान किस प्रकार कर सकता है ? ॥९॥ जो पुरुष अपने हृदयमें दयाको धारण नहीं करता और न जीवका लक्षण जानता है तथा जो आत्माके स्वरूपसे सर्वथा रहित है वह ध्यान कैसे कर सकता है ? ॥१०॥ जो पुरुष आत्मतनसे अनमिज्ञ हैं और जिनका हृदय वाह्य पदार्थोंमें ही लगा हुआ है ऐसे जद मनुष्योंकी आत्मामें निश्चल होनेवाला ध्यान भला कैसे हो सकता है ? ॥११॥ ऐसे लोग शरीर और आत्माको ही अलग करनेमें समर्थ नहीं हो सकते । अतएव मोहकर्मके उदयसे वे पर पदार्थोंका ही चिन्तवन कर सकते हैं आत्माका चिन्तवन नहीं कर सकते ॥१२॥ ऐसे लोगोंको आत्मध्यान करनेका लाभ कमी नहीं मिल सकता, आत्मध्यानका लाभ शरीर और आत्माके भेद-विज्ञानसे ही होता है ॥१३॥ मोक्ष की इच्छा करनेवाले पुरुषों को सबसे पहले आत्माका ज्ञान उत्पन्न करना चाहिये क्योंकि जब तक ध्यान करने योग्य ध्येयका निश्चय नहीं होता तब तक सुनिश्चित ध्यान कैसे हो सकता है ॥१४॥ तथा इस संसारमें ध्येय पदार्थ आत्मा ही है । वह आस्मा तीन प्रकार
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