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________________ म०प्र० मान हि करोति यत् । पारमनैव स्वयंचात्मा मनोक्षविषयातिगम् ॥३९॥ अथवावधिपूर्व हि नियतं देवनारके। जिनोतमवधिझानं देशप्रत्यक्ष तथा ॥३॥ ज्ञानं परोक्षमस्पष्टं सहायसहिदं परम् | मनोहविषयोद्भूतं मतिश्रुतादिकं तथा ॥४॥ सांव्यवहारिक ज्ञानं प्रत्यक्षं तदपि स्फुटम् । तत्वतस्तु परोक्षं हि मनीविषयत्वतः ॥४१॥ नानाभेदं परोक्षं हिमविस्मृत्या. दिकं तथा । मतिस्मृतिस्तथा संज्ञा चिन्ता चाभिनिबोधकम् ॥४२|| मतिज्ञानस्य भेदाः स्युः साधारणा इमे मवाः । भेदा अवमहावायचारणास्तथैव च ॥ बहुविवाक्षिप्रनिमृतोक्तध्र वादयः । इतरेण युताः सर्वे भेदा द्वादशधा परे | ॥४४॥ इन्द्रियानिन्द्रियाभ्या तु मतिज्ञानं च जायते । पदार्थभेदतो भेदाः स्युर्मविज्ञानगोचराः ॥४५॥ व्यंजनार्थस्य चेहादिअवधिज्ञान होता है इसीलिये उस अवधिज्ञानको भवप्रत्यय कहते हैं । क्षायोपशमिक अवधिज्ञानके "अनुगामी अननुमामी दीपमान बर्द्धमान अवस्थित अनयस्थित" ऐसे छह भेद हैं ॥३७॥ जो आत्मा इंद्रिय और मनकी | सहायताके विना केवल आत्माके द्वारा मृत पुदल द्रव्यको प्रत्यक्ष जानता है उसको अवधिज्ञान कहते हैं। अथवा देव नारकियोंके जो मर्यादापूर्वक नियत ज्ञान है उसको भगवान जिन्द्रदेवने अवधिज्ञान कहा है यह अवधिज्ञान भी देशप्रत्यक्ष है ॥३८-३९॥ मतित्रान श्रुतज्ञान दोनों परोक्ष ज्ञान हैं ये दोनों ज्ञान पदार्पोको प्रत्यक्ष वा स्पष्ट नहीं जानते, इन्द्रिय वा मनसे उत्पन्न होते हैं तथा इंद्रिय मनके सिवाय अन्य सहायताकी | मी अपेक्षा रखते हैं ॥४०॥ ये दोनों ज्ञान सांध्यवहारिककी अपेक्षासे प्रत्यक्ष मी कहलाते हैं परंतु वास्तवमें | देखा जाय तो इंद्रिय और मनके विषयोंसे उत्पन्न होते हैं इसलिये परोक्ष ही कहलाते हैं ॥४१॥ मति स्मृति | संज्ञा चिंता अमिनियोध आदिके भेदसे परोक्ष ज्ञानके अनेक मेद होते हैं ॥४२॥ इनके सिवाय मतिज्ञानके साधारण मेद और भी हैं यथा अवग्रह ईहा अवाय धारणा ये चार भेद होते हैं । ये चारों ही ज्ञान all बहु बढुविध क्षिप्र अनिःसृत अनुक्त ध्रुव और इनसे विपरीत एक एकविध अक्षिप नि:मृत उक्त अध्रुव इन चारह प्रकारके पदार्थों को ग्रहण करते हैं इसलिये अड़तालीस मेद होजाते हैं | मतिज्ञानके ये सर मेद पांचों | इंद्रियोंसे तथा मनसे उत्पन होते हैं इसलिये दो सौ अठासी भेद होजाते हैं ये सब पदार्थोके मेदसे अर्थावग्रहके से मेद कहलाते हैं ॥४३-४५।। व्यंजनावग्रह अव्यक्तरूप होता है इसलिये उसके न तो ईहादिक मेद ही होते हैं और न वह चक्षु तथा मनसे उत्पन्न होता है । इसलिये वह चारो इंद्रियों से बहु बहुविध आदि बारह
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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