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________________ ० प्र० ४५॥ चाधा ||१७|| सम्यग्दर्शनपूर्वत्वात्सत्स्वरूपं भवत्यदः । भ्रात्यादिरहितं तब प्रमाणं वस्तुभाषकम् ||२८|| प्रत्यक्षं च परोक्ष द्विविर्थ कानमिष्यते । ज्ञानं प्रमाणमेवाहुः स्वपराभासकं ननु ॥२॥ स्पष्टं हि विशदशानं स्वपर नियामकम् । इन्द्रियविषयातीतं स्यामसंगतम् ॥१०॥ घातिकर्मक्षयोद्भूतं सर्ववस्तुप्रकाशकम् । त्रिकाळ गोचरं ज्ञानं प्रत्यक्षं स्वस्व भावजम् ||३१|| निरावरणमेकं हि शुद्धचैतन्यरूपकम् अनन्त केवलज्ञानं प्रत्यक्षं सकलं मतम् ||३२|| अनन्तानन्दपर्यायं द्रव्यं त्रैकाल्यगोचरम् । स्पष्टं ययुगपचेति यज्ज्ञानं केवलं भवम् ||३३|| पर्यायस्यैकदेशं हि स्पष्टं वेति वि. संशयम् । देशप्रत्यक्ष चाहुः ज्ञानं श्रीमखिनेश्वराः ||३४|| मन:पर्ययकं ज्ञानं द्वे धर्जुविपुखादिभाकू । घा तदवधिज्ञानं भवप्रत्ययमादिमम् ॥३५॥ क्षायोपशमिकं षोढावधिः स्यात्तपसाधवा । श्रयं नारकदेवानां भवेत्तीर्थकरस्य च ||३६|| तद्भव एव चोत्पादकारणं हि मयं जिनैः । अनुगम्यादिभेदेन पोढा स्यादवधिः पुनः ||३७|| मूर्त्तिमल्लद्रयं प्रत्यक्षं पूर्वक होते हैं वे संशय विपर्यय और अनध्यवसायसे रहित होते हैं वस्तु यथार्थ स्वरूपको कहनेवाले होते हैं। और इसीलिये वे प्रमाण माने जाते हैं ||२८|| इन सब ज्ञानोंके प्रत्यक्ष परोक्षके मेदसे दो मेद होते हैं ऐसा स्व और पर पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान ही प्रमाण माना जाता है। । २९|| जो ज्ञान स्पष्ट होता है विशद होता है, म्व और परका निश्चायक होता है इंद्रियों से रहता है और वे आत्मासे उत्पन्न होता है उसको प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं ||३०|| जो ज्ञान घाविया कमोंके क्षय होनेपर उत्पन्न होता है भूत भविष्यत् वर्तमान तीनों कालों समस्त पदार्थों को प्रकाशित करनेवाला होता है और आत्माके स्वभाव भावोंसे उत्पन्न होता है उसको प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं ||३१|| ज्ञान आवरणरहित है एक है शुद्ध चैतन्यस्वरूप है और अनंत केवलज्ञान रूप है उसको सकलमत्यक्ष ज्ञान कहते हैं ||३२|| तीनों कालोंके समस्त द्रव्यों को तथा उनकी अनन्तानंत पर्यायोंको बो एक साथ स्पष्ट जानता है उस ज्ञानको केवलज्ञान कहते हैं ||३३|| जो ज्ञान पर्यायके एक देशको स्पष्ट और संशयरहित जानता है उस ज्ञानको भगवान जिनेन्द्रदेव देशप्रत्यक्ष कहते हैं ||३४|| मनःपर्ययज्ञानके दो भेद हैं एक ऋजुमति और दूसरा विपुलमति । इसी प्रकार सम्भ्यम् अवधिज्ञानके मी दो मेद हैं पहला भात्यक्ष और दूसरा तपधरणसे होनेवाला छह प्रकारका क्षायोपशमिक अवधिज्ञान । पहला मवप्रत्यय अवधिज्ञान देव नारकी और तीर्थकरोंके होता है || ३५-३६|| देव नारकी और तीर्थकरोंके जन्मसे ही भा० र
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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