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________________ मु०प्र० विनाशक , सिध्याभक्सिताना क च स्यात्समुद्धरः ॥२८॥ मिथ्यामताच ते हि समुद्धारो हि चिन्त्यते 1 अपायविचयं ध्यान तम्मतं हि जिनेश्वरैः ॥२६॥ जीचा गृहीतमिथ्यावभावेन प्रेरिता भृशम् । संसाराब्धौ प्रकुर्वन्ति मजनोन्मजन चिरम् ॥३०॥ हिताहितं न जानन्ति मिथ्याधर्म चरन्ति च । तेनैव हेतुना दुःखं सहन्त वे हि दारुणम् ॥३॥ अद्यापिन गृहीतस्तैः सद्धर्मो जिनभाषितः । केनोपायन नयां हि धर्मप्रामिता भवेत् ॥३२।। तदर्थ चिन्तनं नूनमेकाममनसा हि यत् । अपायविचयं ध्यानं तदिह स्यात्सुखावहम् ॥३शा अनादिकालसंभूतं भ्रममोइसमुद्भवम् । कथं निवार्यते तद्धि दीर्घसंसारकारकम् ॥३४॥ तद्भूमस्य विनाशाय शुद्धबुभ्या विचिन्तनम् । अपायविचयाभिख्यं ध्यान तदिह कथ्यते ॥३५।। अयापि मे न संजातं सम्यनत्वं कर्महारकम् । तेन भ्रमामि संसारे तन्मे स्यादिह, वा कथम् ॥३६॥ तत्प्राप्त्यर्थ निजे चित्ते PRERNATIS958 पापोंके नाशका चिन्तवन करना, घोर पापोंसे छुड़ाने के लिये चिन्तवन करना पापोंका नाश करनेवाला अपायविचय नामका धर्मध्यान कहलाता है । तीन मिथ्यात्वमें लगे हुए जीवोंका उद्धार कैसे होगा ? इसप्रकार मिथ्याष्टि जीवोंके उद्धारका बार बार चिन्तवन करना अपायत्रिचय नाका धर्मध्यान कहलाता है, ऐमा भगवान जिनेन्द्रदेव ने कहा है ॥२३-२९॥ गृहीतमिथ्यात्वसे प्रेरित हुए ये जीव इस संसाररूपी समुद्र में चिरकालसे डूबते उछलते रहते हैं, वे जीव अपने हित वा अहितको नहीं जानते और मिथ्याधर्मको पालन करते है, इसीलिये वे जीव सदा दारुण दास सहन किया करते है। इन जीवोंने आजतक भगवान जिनेन्द्रदेवका कहा हआर थेषु धर्म धारण नहीं किया है । उस धर्मकी प्राप्ति इन जीवोंको किस उपायसे होगी? इसप्रकार एकान मनसे बार बार चिन्तवन करना, सुख देनेवाला अपायविचय नामका धर्मध्यान कहलाता है ॥३०-३३॥ दीर्घ संसारको उत्पन्न करनेवाला तथा महामोहसे उत्पन्न हुआ अनादिकालसे चला आया यह भ्रम किस प्रकार दूर हो सकता है। उस भ्रमको दूर करने के लिये शुद्ध बुद्धिसे बार बार चिन्तवन करना अपायविचय नामका ध्यान कहलाता है ॥३४-३५॥ इस संसारमें मुझे कर्माका नाश करनेवाला सम्पग्दर्शन आजतक प्राप्त नहीं हुआ है, इसलिये में इस संसारमें परिभ्रमण कर रहा हूँ, वह सम्यग्दर्शन मुझे कब प्राप्त होगा ? उसकी प्राप्तिके लिये अपने हृदयमें बार बार चिन्तवन करना जिनमार्गको प्रकाशित करनेवाला उपाय
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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