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________________ १० प्र० विचयायोगी प्रददात्यभयं महत् ॥७|| अपायविचयेनैव दीर्थकरा भवन्ति ते सबसस्वानुकम्पांगा जीवमात्रामय पदा: II सिध्यामतवशेनात्मा करोति धर्मघातनम् । सत्यं हितकर धर्मष्टि निन्दति वा प.म् ॥ मध्यामतप्रभाव करोति स्वात्महिंसनम् । बम्भ्रमीति च संसारे नानदुःखनिदानके ॥१०|| केनोपायेन सद्बुद्धिह्मस्य स्यादिमतभ्रमा । कदास्य जैनधर्मस्य प्राप्तिः स्याद्धि सुखावहा॥१शातदर्थ शुद्धभावेन भूयो भूयो विचारणम् । अन्याचन्तां निराकत्य तस्यै काग्रेणचिन्तनम् ॥१शा अपायविचयं ध्यानं तत्स्यात्सद्धर्मदायकम् । सर्वसौख्यकरं शीघ्र जीवानां भवमोचकम् ॥१शा तीत्र मेध्यात्व. भावेन विवेकविकला जनाः । सद्धर्मध्वंसक पापं कुर्वन्ति स्वार्थचेष्टया॥१४॥ स्त्रीणां पुनर्विवाह त कुर्वन्ति पापजिप्सया। तत्प्रचारोपदेशं या मिथ्यात्वेन च कुर्वते ॥१५॥ तेन पापेन ते जीवा दीना श्वध्र पतन्ति च । महाक्लेश महापीडा सहन्स तेच दुर्द्धियः ॥१६॥ केनोपायेन सद्बुद्धिरेषां स्याद्विगतभ्रमा । इत्यपापस्य वेषां हि चिन्तनं यत्पुनःपुनः ।।१७।। सचिन्तां RSSRISHMISHESHARIRISEMISERIES पुरुषों को महाअभयदान देते हैं ॥५-७। इसी अपायचिचय धर्म-यानसे समस्त जीवोंको अनुकंपित करनेवाले और जीवमात्रको अभयदान देनेवाले तीर्थकर होते हैं ॥८॥ मिथ्यात्र कर्म के उदयसे यह प्रात्मा धर्म का घात करता है, आत्माका हित करनेवाले यथार्थ धर्मसे द्वेष करता है वा उसकी खूब निन्दा करता है । | मिथ्यात्व मनके प्रभावसे यह जीव अपने आमाका घात करता है और अनेक दुःखोंसे भरे हुए संसारमें परिभ्रमण करता रहता है । ऐसा यह जीव किस उपायसे श्रेष्ठ बुद्धि को धारण करेगा ? कब अपन भ्रमको दर | करेगा ? तथा सुख देनेवाली जैनधर्मकी प्राप्ति इसे कब होगी ? इसके लिये शुद्ध भावोंसे बार बार विचार करना, अन्य सब चिन्तवनोंको रोककर एकाग्र, मनसे बार बार चिन्तवन करना अपाय विचय नामका धर्मध्यान है। यह ध्यान सद्धर्मको देनेवाला है और संसारसे छुड़ानेवाला है ॥९-१३।। तीन मिथ्यात्वके उदयसे ये जीव विवेकरहित हो जाते हैं और अपने स्वार्थके वश होकर धर्मको नाश करनेवाले महापाप उत्पन्न करते रहते हैं। वे जीव पापोंकी प्रवृत्ति करनेकी इच्छासे स्त्रियों का पुनर्विवाह करते हैं और तीव मिथ्यात्वके | उदयसे उसका प्रचार करते हैं वा उपदेश देते हैं, उसी पापके उदय से वे दीन जीव नरकमें पड़ते हैं और | दुर्बुद्धिको धारण करनेवाले वे जीव महापीडा और महाक्लेशों को सहते हैं। ऐसे जीवोंका भ्रम कब दूर होगा? और उनको कर सधुद्धि होगी? इसप्रकार उनके पापोंको दूर करनेके लिये मन, वचन और कायकी
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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