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________________ श्री: * भीवीतरागाय नमः मुनिराज श्रीधर्मसागरविरचितः • सुधर्मध्यान- प्रदीपः • reciteration | 69050 बंदों हृषभ जिनेशके, चरण सरोज उदार । धर्म- ध्यान- प्रदोषकी, करूं वचनिका सार ॥ ज्ञानात्मरूपाय निरञ्जनाय मोहादिदोषप्रविघातकाय | शिवाय शान्ताय शिवप्रदाय स्वानन्दकन्दाय नमो जिनाय ||१|| शुद्धाय शुद्धाय गुणान्विताय कर्मव्यतीताय चिदात्मकाय । नित्याय जन्मान्तकभेदकाय सिद्धाय पूज्याय नमो नमोऽस्तु ||२|| वृत्तप्रवीणं समितीद्धमुद्धमाचारवन्तं समयज्ञकं च । स्वात्मानमेवात्मनि भावयन्तं सूरिं प्रबन्दे जिनभावलानम् ||३|| जो भगवान् जिनेन्द्रदेव ज्ञानस्वरूप हैं, रागद्वेषादिकसे रहित हैं मोहनीय आदि समस्त दोषोंको नाश करनेवाले हैं, सबका कल्याण करनेवाले हैं, अत्यन्त शान्त हैं, मोक्षके देनेवाले हैं और आनन्दस्वरूप है; ऐसे भगवान् जिनेन्द्रको मैं नमस्कार करता हूँ ||१|| जो सिद्ध परमेष्ठी शुद्ध हैं, बुद्ध हैं, अनन्त गुणोंको धारण करनेवाले हैं, कर्मरहित हैं, शुद्ध चैतन्य-स्वरूप हैं, नित्य हैं, जन्म-मरणको नाश करनेवाले हैं और पूज्य है; ऐसे सिद्ध परमेष्ठीको मैं बार बार नमस्कार करता हूँ ||२|| जो आचार्यचारित्र पालन करनेमें निपुण है, समितियोंका पालन करते हैं, पंचाचारका पालन करते हैं, समय वा शास्त्रोंके जानकार हैं, अपने आत्मामें जो अपने SEARC
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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