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________________ ० प्र० ।। १३६ ।। प्नोति भन्योऽत्र सहजं शुभम् ||३५|| मनःपर्ययविज्ञानं समाप्नोति प्रसन्नधीः । धर्मध्यानबलेनैव केवलज्ञानसाधकम् ||३६|| | शुक्रध्यानस्य सम्पतिर्जायते वा शुभा । धर्मस्यानवलेनैव तद्धधानं परिगृह्यताम् ॥३७॥ शुद्धोपयोगभावस्य विभूति: सुखदा शुभा । धर्मध्यानबलेनैव वर्द्धते हि निरन्तरम् ||३८|| इन्द्रनागेन्द्रदेवानान दमिन्द्रपदेशिनाम् । धर्मध्यानबलेनैव विभूतिः प्राप्यतेऽनिशम् ||२६|| चक्रवर्तिपदादीन प्राप्तिः स्याद्धि सुखावहा । धर्मध्यानबलेनैव भव्यानां पुण्यसाधिका ||४८ ॥ तद्वयानं द्विविधं प्रोर्क बायाभ्यन्तरभेदतः । तुर्यात्सनमपर्यन्तं प्रो श्रीमज्जिनेश्वरैः ||४१॥ श्रभ्यन्तरं हि भव्यानां ध्यानं किल्बिषदायकम् भावशुद्धकरं चास्ति वात्मवीर्यसुबद्ध कम् ||४२|| देवपूजा गुरोः सेवा जपो धर्मोपत्तेव नम् । संयमधारणं चैत्र सर्वे वे साधका मताः ||४३|| वीतरागेण भावेन यदा किंचिद्विचिन्तनम् । धर्मध्यानं तदाख्यातं 5 भव्य जीवको अवधिज्ञान प्राप्त हो जाता है और शुरूप भावश्रुत ज्ञान मी सहज रीति से प्राप्त हो जाता है। ||३५|| इस धर्मध्यानके ही बलसे प्रसन्न बुद्धिको धारण करनेवाला भव्य जीव केवलज्ञानका साधक ऐसे मन:पर्यय ज्ञानको बहुत शीघ्र प्राप्त कर लेता है || ३६ || तथा इसी धर्मध्यानके बलसे परम शुभ ऐसी केवलज्ञानकी संपत्ति प्राप्त हो जाती है । इसलिये भव्यजीवों को यह धर्मध्यान अवश्य धारण कर लेना चाहिये ॥ ३७ ॥ सुख देनेवाली और शुभरूप जो शुद्धोपयोगरूप भावकी विभूति है, वह इस धर्मध्यानके ही बलसे निरंतर बढ़ती रहती है ||३८| इस धर्मध्यानके ही से इन्द्र-नागेन्द्र आदि देवों की विभूति प्राप्त होती है और अहमिन्द्र पदके स्वामी अहमिन्द्रोंकी विभूति भी इसी धर्मध्यानसे प्राप्त होती है ॥ ३९॥ महानुष्यको सिद्ध करनेवाली और अत्यन्त सुख देनेवाली चक्रवर्ती आदि पदोंकी प्राप्ति भी मध्य जीवों को इस धर्मध्यानके ही बलसे होती है ॥४०॥ बाह्याभ्यन्तर के भेदसे उस धर्मध्यानके दो भेद हैं- तथा चौथे गुणस्थानसे लेकर सातवें गुणस्थान तक यह धर्मध्यान होता है ||४१ ॥ उसमें भी अभ्यन्तर धर्मध्यान मध्य जीवोंके समस्त पापको नाश करनेवाला है तथा भावोंको शुद्ध करनेवाला है ओर आत्माकी शक्तिको बढ़ानेवाला है ||४२ || देवपूजा करना, गुरुकी सेवा करना, जप करना, धर्मसेवन करना और संयम धारण करना आदि सब उम्र धर्मध्यानके साधक हैं ||४३|| समस्त पापोंको जीतनेवाले मुनिलोग अपने वीतराग भावोंसे जो कुछ चिन्तवन करते हैं. मा० ।। ९३६
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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