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________________ सु० प्र० ॥ ८५ ॥ केन विश्वसिद्धिः प्रजायते ||८|| मनःसंरोधनेनैव परा शुद्धिः प्रजायते । शरीरेन्द्रियशुद्धिस्तु तेनैव च स्वयं भवेत् ||६|| एकैव सा मनःशुद्धिरलं ध्यानादिकर्मसु । यया च प्राप्यते सिद्धिरन्तस्तत्त्वस्य देहिनाम् ||१०|| चित्तशुद्धिः स्थिरीभूता यस्य साधोनिरन्तरा । मनोरथांस्तु सर्वान् स ध्यानेन लभते ध्रुवम् ॥ ११३ ॥ श्रादी कृत्वा मनःशुद्धिं पश्चाद्वयानं समाचरेत् । मनः शुद्धि दिना ध्यानं न भूतो न भविष्यति ||१२|| मनःशुद्धिमकृत्वा यः गंगादौ हि पुनः पुनः । करोति देशुद्धि वा संसाराब्धौ स मज्जति ॥ १३ ॥ मनो रुद्धं न येनात्र ध्यानं सोत्र करोति किम् । मनोरोधबजेनैव तद्ध्यानं स्यात्स्वत. स्वयम् ||१४|| चित्तशुद्धिमनासाध्य ध्यानं कर्तुं य इच्छति । बालुकापीडनं कृत्वा तैलमिच्छति मूढचो. १११५॥ कोटिजन्मान्तरे यद्धि पापं क्षिपति वृत्ततः । स्वल्पेन समयेनात्र क्षिपने चित्तरोधतः ॥ १६॥ पापास्रवं हि संहृद्धय चित्तशुद्धमा परंपराको रोकनेवाली अत्यन्त दृढ़ ध्यानरूपी संपत्ति एक मनको वश करनेसे ही होती है। तथा इसी मनको करने से समस्त सिद्धियां सिद्ध हो जाती हैं ||८|| मनको वश करनेते आत्माकी उत्कृष्ट शुद्धि हो जाती है और शरीर तथा इंद्रियोंकी शुद्ध भी मनको वश करनेसे स्वयं हो जाती है ||९|| यह एक मनकी शुद्धि ही ध्यानादिक कार्योंके लिये मुख्य साधन है, इसी मनकी शुद्धिसे प्राणियों के अंतरात्मा की सिद्धि होजाती है ||१०|| जिस साधुके मनकी शुद्धि निरंतर स्थिर रहती है, उसके समस्त मनोरथ एक ध्यान से ही सिद्ध हो जाते हैं ॥ १९ ॥ साधुको नबसे पहिले मनकी शुद्धि करनी चाहिये और फिर ध्यान करना चाहिये । क्योंकि मनकी शुद्धि विना ध्यान न कभी हुआ है और न कभी होगा ॥ १२ ॥ जो पुरुष मन की शुद्धि किये बिना गङ्गा आदि नदियोंमें शरीरशुद्धि करते हैं, वे संसाररूपी समुद्र में अवश्य डूबते हैं || १३ || जिसने अपने मनको में नहीं किया है, वह इस संसारमें ध्यान ही क्यों करता है? क्योंकि मनको वशकर लेनेसे वह ध्यान अपने आप हो जाता है | १४ || जो मनुष्य मनको शुद्ध किये बिना ध्यान करने की इच्छा करता है, वह मूर्ख बालूको पेलकर तेल निकालना चाहता है ||१५|| जो पाप करोड़ों जन्मोंमें चारित्र धारण करनेसे नष्ट होता है, वह पाप मनको वश में कर लेनेसे थोड़े ही समय में नष्ट हो जाता है || १६ || निर्मल बुद्धिको धारण करनेवाले और मोक्ष की इच्छा करनेवाले भव्य जीवोंको अपना मन शुद्धकर पापके आवको रोकना चाहिये और ध्यान XXX भा NE
SR No.090480
Book TitleSudharma Dhyana Pradip
Original Sutra AuthorSudharmsagar
AuthorLalaram Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages232
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Yoga
File Size8 MB
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