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मन्त्र की निष्काम साधना से लौकिक और पारलौकिक सभी कार्य सिख हो जाते हैं। पञ्च परमेष्ठी नमस्कार स्तोत्र में कहा गया है
एसो परमिट्ठीणं पंचण्हं वि भावओ णमुक्कारो।
सब्चस्स कीरमाणो, पावस्स पणासणो होइ ॥ ६ ॥ पंचपरमेष्ठी को भाव सहित किया गया नमस्कार समस्त पापों का नाश करने वाला है।
सयलुज्जोइय भुवणं विदाविय सेस सत्तु सघायं !
नासिय मिच्छत तमं विलिय मोहं हय तमोइ ।। ३० || यह पंच नमस्कार चक्र समस्त भुवनों को प्रकाशित करने वाला, सम्पूर्ण शत्रुओं को दूर भगाने वाला, मिथ्यास्वरूपी अन्धकार का नाश करने वाला, मोह को दूर करने वाला और अज्ञान के समूह का हनन करने वाला है ।
डॉ० नेमिचन्द्र शास्त्री ने 'मंगलमय णमोकार : एक अनुचिन्तन' पुस्तक में मन्त्र के स्वरूप और माहात्म्य का अच्छी तरह से मूल्यांकन किया है ।
प्राचीन साहित्य में शिवार्य कृत भगवती आराधना में मुनि श्री सुदर्शन के विषय में एक गाया मिलती है
अन्नाणीविय गोवो आराधित्ता मदो नमोक्कारं ।
चंपाए सेटिकुले जादो पत्तो य सामन्नं ।। ७५८ ।। अर्थात् अज्ञानी होते हुए भी सुभग गोपाल ने णमोकार मन्त्र को आराधना की, जिसके प्रभाव से वह मरकर घम्पानगर के अष्ठिकुल में उत्पन्न झुमा और श्रामण्य को प्राप्त हुआ।
भगवती आराधना में जो कथायें आई है, उनका विस्तार से वर्णन करने वाली कुछ रचनायें प्राप्त हुई हैं। इनमें सुवर्शन मुनि की कथा वर्णित है।
विक्रम संवत् ९८९ तथा शक संवत् ८५३ में हरिषण द्वारा लिखे गए बृहत्कथाकोश में ६०वीं कथा सुभग गोपाल की है। यह १७३ पधों में पूर्ण
ग्मारहवी शताब्दी के अन्त में प्रभाचन्द्र ने आराधना कथा प्रबन्ध (कथाकोश ) या आराधना सत्सुकथा प्रबन्ध की रचना की । इसमें २३वीं आराध्यनमस्कारमित्यादि कथा सुभग ग्वाले की अत्यन्त संक्षिप्त रूप में की गई है, जो इस प्रकार है____ मन देश में चम्पा नगरी में राजा नृवाहन तथा सेठ वृषभदास था। सेठ के गोपाल ने एक बार पर आते हुए निश्चल आमा को प्रकट करने वाले