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________________ सिद्धान्तसारादिसंग्रहे जहया मणुणिग्गंथ जिय तड़या तुह णिग्गंथु । जहया तुहु णिग्गंथ जिय तो लब्भह सिवपंथु ॥ ७२ ॥ ६८ MA यावत् मनोनिग्रन्धः जीव ! तावत्वं निर्मन्थः । यावत्रं निर्मन्थः जीव ! ततः लभसे शिवपथं || जं मझह बीज फुड बीयह वड वि हु जाणु | तं देहं देउ वि हि जो तइलोय पहाणु ॥ ७३ ॥ . यथा बटमध्ये बीजं स्फुटं बीजे बटमपि जानीहि । तथा देहे देव मन्यस्त्रयः त्रिलोके प्रधानः || जो जिण सो हउ सो जि हउ एहउ भाउ णिभंतु । मोक्खह कारण जोइया अण्णु ण तंतु ण मंतु ॥ ७४ ॥ यो जिनः सोऽहं सोऽप्यहं एतत् भावय निर्भ्रान्तिम् 1 मोक्षस्य कारणं योगिन् । अन्धो न तंत्रः न मंत्रः || येतेच उयंचविण व हंसतहछहपंचाह चगुणसहियउ जो मुहि एहउ लक्खण जाह ।। ७५ ।। द्वित्रिचतुःपंचद्विनवसप्तषट्पंच चतुर्गुणसहितं यः मनुते एतदक्षणं यस्मिन् ॥ वे लंडवि वैगुणसहिउ जो अप्पाणि बसे । जिणसामित्र एवं भगड़ लहु शिव्याण लहेइ || ७६ ॥ द्वौ त्यक्त्वा द्विगुणसहितः य आत्मनि वसति । जिनस्वामी एवं भणति लघु निर्वाणं लभते ॥ तिहरहिउ तिहगुणसहिउ जो अप्पाणि वसेद । सो सासय सहभाणु वि जिणवर एम भणेड़ || ७७ ॥
SR No.090474
Book TitleSiddhantasaradisangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherM D Granthamala Samiti
Publication Year1979
Total Pages349
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size5 MB
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