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________________ योगसारः । सुद्धपएसह पूरियड लोयायासपमाणु । सो अप्पा अणुदि मुण पावडु लहु णिव्वाणु ॥ २३ ॥ शुद्धप्रदेशः पूरित: लाकाकाशप्रमाणः । तं आत्मानं अनुदिनं मन्यस्व प्राप्नोषि लघु निर्वाणं ॥ णिच्छ लोयपमाण मुणि बवहारइ सुसरीक | एहउ अप्पसहाउ मुणि लहु पावहु भवतीरु ॥ २४ ॥ निश्चयेन लोकप्रमाणं मन्यस्त्र व्यवहारेण स्वशरीरस्य । इमं आत्मस्वभावं मन्यस्व लघु प्राप्नोषि भवतीरम् ॥ चउरासीलक्खह फिरिङ काल अणाइ अणंतु । पर सम्मत्त ग लड जिउ एहउ जाणि भिंतु ॥ २५ ॥ चतुरशीतिलक्षे भ्रमितः कालमनाद्यनन्तं । परं सम्यक्त्वं न लब्धं जीव 1 एतज्जानीहि निर्भ्रान्तम् ॥ ५९ सुद्ध सचेण बुद्ध जिणु केवलणाणसहाउ | सो अप्पा अणुदिण मुण जह चाहउ सिक्लाहु ॥ २६ ॥ शुद्धः सचेतनः बुद्ध: जिनः केवलज्ञानस्त्रभावः | तं आत्मानं अनुदिनं मन्यस्य यदीच्छसि शिवलाभं ॥ जाम ण भावहु जीव तुहुं णिम्मलअप्पसहाउ | तामण लम्भइ सिवगमणु जहिँ भावहु तहिँ जाउ ॥ २७॥ यावन्न भावयसि जीव त्वं निर्मात्मस्वभावम् । तावन्न लभसे शिवगमने यत्र भाति तत्र याहि ॥ जो तहलोयह झेउ जिणु सो अप्पा बिरु वुत्तु । णिच्छयणइ एमइ भणिउ एहउ जाणि भिंतु ॥ २८ ॥ यस्त्रिलोकस्य ध्येयो जिनः स आत्मा निजः उक्तः । निश्चयनयेन एवं भणित: एतज्जानीहि निर्भ्रान्तम् ॥
SR No.090474
Book TitleSiddhantasaradisangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherM D Granthamala Samiti
Publication Year1979
Total Pages349
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size5 MB
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