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________________ सिद्धान्तसारादिसंग्रहे ----.......-..----.- .marrrrrrrrrrrrrr-rrr------ यदि बिभ्यति चतुर्गतिगमनात् ततः परभावं त्यज । आत्मानं ध्याय निर्मलं येन शिवसुर्ख लभसे ॥ तिपथारी अप्पा सुगाह पर अंतर नाहरपु । पर झायहि अंतरसहिउ बाहिर चयहि णिभंतु ॥६॥ त्रिप्रकार आत्मानं मन्यस्थ परमन्तो बहिरात्मानम् । परं ध्याय अन्तःसहित बाह्यं त्यज निर्धान्तम् ।। मिच्छादंसणमोहियट परु अप्पा ण मुणेइ । सो बहिरप्पा जिणभणिउ पुण संसारु भमेइ ॥ ७॥ मिथ्यादर्शनमोहितः परमात्मानं न मनुते 1 स बहिरात्मा जिनमणितः पुनः संसारे भ्रमति ।। जो परियाणइ अप्प पर जो परभाव चएइ । सो पंडिउ अप्पा मुणहि सो संसार मुएइ ।।८।। ___ यपरिजानात आत्मानं परं यः परभावं त्यजति । स पंडित आत्मानं भनुते स संसारं मुञ्चति || णिम्मलु णिकलु सुद्ध जिणु किण्हु बुद्ध सिव संतु । सो परमप्पा जिणणिउ एहउ जाणि णिभंतु ।। ९॥ निर्मलो निष्कलः शुद्धः जिनः कृष्णः बुद्धः शिवः शान्तः । स परमात्मा जिनभणित: य जानीहि निभ्रान्तम् ॥ देहादिउ जे पर कहिया ते अप्पाण मुपोइ । सो बाहिरप्पा जिणभाणिउ पुण संसार भमेह ॥१०॥ देहादयो य परे कथिताः तान् आत्मानं मनुते । ___ स बहिगत्मा जिनमणितः पुनः ससारे भ्रमति ।। देहादिक जे पर कहिया ते अप्पाण ण होइ । इउ जाणेविण जीव तुहुं अप्पा अप्प मुणेइ ॥ ११ ॥
SR No.090474
Book TitleSiddhantasaradisangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherM D Granthamala Samiti
Publication Year1979
Total Pages349
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size5 MB
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