SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 266
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पूर्णी १२६८॥ Ka ज्जवमाणे णाम जाणे समुप्पन्न । सामी छद्रेणं भत्तण अप्पाणएणं इत्युत्तराहि णक्खसहि जोगमुदागतेणं एग देवसमादाप णिगिणे मविचाणं ते वामे संघे काउं, जीतमिनि, आगाराओ अणगारियं पचहए । एत्थ गाहाओ स्वोपमयों उपोषाव एवं सदेषमणु.॥भा.१०५।। उ संपसोभा .. जिपर |भा.१०७॥ दिदा मणुस्सा |भा.१०८॥ नियुक्ती काऊण । भा. १०९ ॥ निहिं नाणेहिं । भा. ११०॥ तए ण सामी अहानिहिए मचे नायए आपुच्छिना जायसंडपहिया चउम्भागबसेसाए परिसीए कंमारग्माम पहावितो, एत्यंतरा पितुवयंसो धिजानितो उवाविनो. अमे भणंति- जदा चरितं पडिवज्जति तदा उवहितो, सो य दाणे कर्मिपि गतेलजो, पच्छा जागता मज्जाते अंशडिए, मामिणा एवं परिचने तुमं पुण बाईगणिवणाणि हिंडसि, जाहि जदि एत्यंतरेऽवि लमेज्जासित्ति, सो मणति जहा-सामि ! मम न किंचि तुमहिं दिलं, इयामिपि देहिति, वाहे सामिणा तस्स देवड्सस्स अई दिलं, अर्थ परिचरीति, तं तेण तुषागस्म उवणीयं, जहा एयरस दसिया संघाहि, तेण पुच्छित-इमं करोति, मगा- भगवया दिधति, सातुमाओ भणइ-लपि से अद्ध आणेहि, जया पडिहिति मगरओ अंसाओ सदा आणज्जासि, तो में अहं तुमेहामि वाहे सयसहस्सं मोह मविस्सइ, तो तुज्झवि अद्धं ममवि अद्धति, पडिबनो, ताहे सो मगवं पोलग्गिओ, सेस उपरि मनिही । तत्व य दो पंचा-एगो BI पाणिए एगो पालीए, सामी पालीए जा बच्चति वाय पोरुसी साचावसेसा जावा, संपतो यहै गार्म, तस्स बाहिं सामी परिमारा । ठितो, सहिमगवान दिन्बेहि गोसीसातीएहिं चंदणेहि चुबेहिं नहावामेहिय पूफेहिय वासियदेहो निक्सममामिसेमेण पामिसित्तो
SR No.090462
Book TitleAgam 40 Mool 01 Aavashyak Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRushabhdev Keshrimal Jain Shwetambar Sanstha Ratlam
PublisherRushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publication Year1985
Total Pages617
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_aavashyak
File Size18 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy