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________________ जाहे जिक्खमणसक्कार कमि, पिटुपानाहलाएं बाणिमनगा वताए लिंगरगहण उवडापत ताह मक्कण देविदेव वंदितो, किपिलस्य) श्रावश्यक जनेहि य, साहे मग एर्ग पुलमयमहम्मं केवलिपरियागं पाउणिचा मामिएणं मनणं अपाणगेण समणेण णक्खचेण परिनिए परिव्रा जकना अहावए । मरहसामी दसहि गयमहमहम्महि मद्धि पब्बी । मेमा णच नक्किा माहम्मपरिवारा पवइया 1 आइक वजमा नियुक्ती सक्केण आमिसिनो । एवं अट्ठ पुरिमजुगाणि अभिमित्तनि । IMI इयाणि कधिलित्ति दानत्य पच्छताण कडेनी ॥ ३ ॥ २०॥ सो य मिरिती मामिमि परिनिन्छाएवि माहिर ॥२२८॥ समं विहरति, तम्म य विहरमाणम्म जो उबट्ठानि न पच्यावेऊण माधणं देति, जाव सो अभया कयाती गिलाणो जाती, ताहे साधुणो असंजयम्म बेयावडिया ए कजीननि नेणं ते ण कति, ताहे सो मकिलिट्ठो चितेह-अहो इंम माधुणो निगणुकंपा. इयाणिं बदि उडेमि जो य मे उहावेनि त अप्पणो चेत्र पयामि, एवं सो अमया रोगविमुस्को विहरनि, तन्य कविलो नाम रायपुत्तो, सो तस्म पामे धम्मं गुणति, इमो य मे अणगारधम्म पनवेति, ताहे सो भणति- तुम्मे अभहा ठिता, इमं च अमहा पनवेह, मिरिती मणति- एम मापूर्ण धम्मो, अहं पावकम्मो ण मक्केमि काउं, सो भणति- एत्थ तुम्भ अस्थि किंचि !, ताहे सो मगइ- एतेसु अन्थि, इवि मणाग, गत्यंतरापण दुम्भामिण समारो अणेण यडितो कुधम्म वईवेण, जेण मागरोबमकोडा४.कोडि भमितो। है मूल संसारो॥॥२५२ ।। मोवि कपिला प किंचि परिवज्जति साहगं, ताहे मिरीई चिंतति- एस साधणं गाहणे ॥२२८।। गेहति, मम य वितिज्जेणं कज्ज तम्हा पवावेमि, मो जेण पन्नावितो । एवं सो तेण सम विहरति, एवं काले वचते अपणो
SR No.090462
Book TitleAgam 40 Mool 01 Aavashyak Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRushabhdev Keshrimal Jain Shwetambar Sanstha Ratlam
PublisherRushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publication Year1985
Total Pages617
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_aavashyak
File Size18 MB
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