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________________ श्री आवश्यक चूर्णौ उपोषात निर्युक्तौ 1120811 कई उवसामेति ?, अति-पग जोगेहि जहा अग्गी विज्झायसरियो हेठ्ठा अच्छति सासेसो एवं उवसामओ कम्मं उबसामेति, जहा वा जलं कयगकलादीहि णिमंतमलं पर्यंतं भवति नं च तव अच्छति, जहा मो अंजणामयो जति वेदिउं मूले पलीवितो अग्गए ठाति एवं उवसामओऽवि । तन्थ हमा दारगाहा - अणदंस० ।। २-३७ ।। उपमामगसेपिओ नियमा संजओ, खवगमेढए पुण संजतो या असंजतो वा संजप्तासंजतो वा, एवं सो पसस्थेसु अज्झनसाणहाणम् चट्टमाणो विसुज्झमाणो अर्णताणुबंधिकोहमाणमायालोभे जुगवं वसामेति ताहे सम्मर्ण मिच्छादंसणं सम्मामिच्छादंसणं निहिं जुगवं उनमामेति, ताहे णपुंगवेदं उवसामेति, ताहे इन्श्रीवेदं उवसामेति, पच्छा हामरनिअरतिभयसोगदुगुच्छसि एते छकम्पं जुगवं उवसामेति, पच्छा पुरिसंवेदं उद्यमांमति, एवं ता पुरिसे, इत्यचि एवंमंत्र व मध्यपच्छा इत्थवेदं, एवं नपुंमओऽवि वरं पच्छा पुंगवेद, पच्छा दो दो एगंतरित अप्पच्चक्खाण कसायं कोहं पच्चक्खाणावरणं च कोहं दोवि जुगवं उपसमिति, तांह मंजलणं कोई उवसामेति, पच्छा अपच्चक्खाणमाणपच्चक्खाणावरणमाणा दोवि जुगवं पच्छा संजलणमाणं उनमामेति, पच्छा अपच्चक्खाणपच्चक्खाणावरणमायाओ दोवि जुगवं उवसामेति, वाहे संजलणमायं उवसामेति, पच्छा अपच्चक्खाणं पञ्चवाणावरणं च लोभ दोषि जुगवं उवसामेति, जो संजलणलांभो तं संखेज्जाई खंडाई करेनि, पच्छा उवसामेति, पढमिल्युगं च भागं उवममितो एत्थ बादरपरागो उवसामओ लब्भति, जं तं संखज्जतिमं खंडं तं असंखज्जभागे करेति, पढमं च पत्रेदिनो ताहे मुहमपरागो उवमान लम्भति, समए समए खंड एकैकं उवसामिति । तत्थिमा गाथा विभामियन्या उपचमश्रेणिः ॥१०४॥
SR No.090462
Book TitleAgam 40 Mool 01 Aavashyak Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRushabhdev Keshrimal Jain Shwetambar Sanstha Ratlam
PublisherRushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publication Year1985
Total Pages617
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_aavashyak
File Size18 MB
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