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________________ सप्ततिका ॥ ३॥ अह तस्स पहियनिरपपरविकस्स सोमवंदस्त । मायंगिश्वसुरषिकासाहरुमेहा समुपला ॥१॥ तीसे एसो र विही चंडालिखिगेहसंविएत हि । कवि विही बिहेयो मायंगसुये विवाहिता ॥६॥ एमितिको निवेवं सहोयरेखाधि वारिट सोमो । घश्यविशारसिड गळ कुणालाइ नयरीए ।। ६३ ।। सत्य पणदयविवरणपूर्व मागिर्षि विधाहे सिरिषीकयपधिकायापारो सुझमहि ॥ ३४॥ अधषियकुवायारो घामकायकिई बाई । ताए भासतो जाउँ पुप्तापरिवारो ॥ ३५॥ तेह कुमग्गाधमिए कम्मनभिएस ताबनाया। दूरे पत्ता वसा जइवए गोधरस्सेव ॥६६॥ वह सिरदो दोब निस्मयो निककमंझला सबकलाकोसोक्षगडे सुश्सीखसीबल॥६॥ कश्यादि कोटहार अतुषमासवं बहतो या धारूहिब वरविमाएं सुंदरिमितजसपसरो॥६॥ सिरपरिवधषतरत्तो पसो जगई जंबुदीवस । महया विधवं किहुँ कार्ड स परियरिज ॥ ६ ॥ किलित्ता तत्व मिहं पचशि सखियकुंमपाइरहो। कहषि नयरी कुणाला सरि बचत पत्तो ॥१०॥ नेहेण समुत्तरिड जरिड पुनोदएण पुष । निवजावरं पक्षोय अश्नेहसनयएजुयलेणं ॥ ११ ॥ श्य जंपिकमारक विरूपमेयं कर समायरियं । तुमए अहो सहोयर सोधिनु कुखकम निययं ॥७॥ मषितीकडे करपा तुमए निंदियकुले वसंतेख । मागकलेवररत्तो काउच तुमं अहो जा॥३॥ चरहिरहतनासर्वदर पहस्पते । किन पस्ससि पोरं असिनया दरडे अंतं ॥ ५॥
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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