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________________ पञ्चंत गामवासी अनिवहंतो स संपत्तो ॥ ४४ ॥ तत्तो सयमेव हवं बाहर साहइ किसिं किसंगोधि । इस वित्तो दोसगयवरो सरिसं समागम्म ॥ ४५ ॥ श्रबंधिकोहनामेऽहवा वेसानराप (व) ररकेण । जिसुए तस्स य ताय जल सिहपासे ॥ ४६ ॥ पुषमवमहं खलु विचालए परमहो समागञ्च । सम्मसत्तू पवि तो वयं नका ॥ ४७ ॥ * संपश्यमत्थि ( तत् स नत्थि ) तुम्हे न वीसमेह नियंता । श्रासह मन (ह) श्र नियनुयविरियं खु दंसेमि ॥ ४८ ॥ तायप्पसायर्जु तं पड़ा वालेभि इकहलाए । तो पिणापुन्ना जलसिहस्संतियं पत्तो ॥ ४ए ॥ तस्संनिदाए सर्ज जड़-: त्थनामो इमो हु संपत्तो । थेवेवि हु वराई रूस न हु तूसइ कहिंपिं ॥ ५० ॥ ताम फोमश जंगे चंकेश कोहकल । वट्ट घट्ट पाएहिँ मायर डुबिणीयतया ॥ ५१ ॥ पियरंपि हु अवमन्नइ न गए नियत्रंधणे (धुलो) तासमेवि । देवगुरूचि विमुहोस संमुहं नए दुधयां ॥ ५२ ॥ तत्तो सो परिचत्तो सर्ववि परिया रोगिव । विडोदिsसञ्जरोगो सोगोवगर्छ दुई बाढं ॥ ५३ ॥ ऋह अन्ना का निवदमाशो नाणोवर्जगपरिमुक्को | चंकालकुले लग्गो खिसाएं ख (खि) मणकसु ॥ ५४ ॥ पन्ते वासारते बंगलयं खेमए नवे खित्ते । न चल इको गलियारते तरुणोवि ॥ ५५ ॥ बेसानरेष एसो श्रदिछि गाढमेव खित्तम्मि । तो तामइ निस्संकं राहिं दूव वसई ॥ ५६ ॥ तद्धि अचलंतमयं । मम्मम्मिय दर हयासो सो । कम्रियजीहो दीयो परि गोलो महीवीदे || ५७ ॥ तो वैसानरविवस अत्यं | बारुवो सुपिस्संतो। दंताई पुत्रमेयस्स मोमय तोकए कैसे ॥ २० ॥ तद्वि न उड़ जा जुयलयात ता ख (खि) मियखितमखएहिं । तह पिट्टि जसो पाले खरोए परिचत्तो ॥ ५ए ॥ तदवि न रोसाम्गिजरो जवस मिर्च तस्स समि 249
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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