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जर्मते निवत ॥ १२ ॥ तबंसजेश खइ छह जंगुलिएस रायनिद्देसा । श्राहूया बहुचदियो मंतबले कप खविचं ॥ १३ ॥ सचे मंगलम पवेसिया जासिया य तो तेण । रुको जेण निवसु सो चि तदियरे जंतु ॥ १४ ॥ सबै वि गया सप्पा एगो तत्थैव निच्चलीहू । सो मंतवाणुत्तो श्रावियसु बिसं नियं मुक्कं ॥ १५ ॥ जइ न पियसि तो निवमसु जलिरखासम्म जो जाईयेही गंध गंधा चेव ॥ १६ ॥ सोय अगंधणनामो तन्नामाणो अव माणधरा । श्रग्मिम्मि त पछि नमित नियमादोसे ॥ १७ ॥ तं विसं न गहियं नूषं तेयादिणा सुकुम्मणा । रायंगले बि हु मर्ज विसमाहप्पं हो पयमं ॥ १८ ॥ रु महीवणा पल्ला घोसावियं सरजम्मि ! श्राणे जो श्रीएं सीसं तस्साहम प्रेमि ॥ १७ ॥ दीहारमेगमित्तो लोट लोहाचलो दिललाई । मारितु मत्ययाई तेसिमदापेजमाढतो || २० || दीवारे देइ निवो तम्मि कुल म्म साडुखम (व) गजि । छप्पन्नो तं जाइसरं सहावेण नागकुलं ॥ २१ ॥ रति हिंमासीखं दिएम्मि तं नमइ नेव कत्थावि | जीवाण हिंसनया नयन्नवदादोसे ॥ २२ ॥ श्रह हिंरुए केवि नरेण सप्पाण सीसकए । न दिवा दिको सप्पो कोवि त रत्तिनमिरे || १३ || दिहं दिछीइ फुरुं खवगाहिस्सेव तस्स गुचिजबिलं । तद्दारम्मि विडं सो तो चिंतइ बिसहरो चित्ते ॥ २४ ॥ अहद कई तायबं न य दियदे निस्सरामि पावनया । तहवि श्रणं रुको मने पुण वाचमसमत्यो ॥ २५ ॥ दिषो को विवागो कस्सवि जबरिं करेमि न दु रोसं । गछिस्समहिमुहो जइ तो डु महिस्सामि तद्देहं ॥ २६ ॥ निग्गर पुछेणं चेव त जित्ति विधि | तित्ति यमितो बो हितुनियमाशवो कूरो ॥ २७ ॥ सीसंपि तेष निम्नं जाव मर्ज दिदिविसकाही सोय । परिधि सुरीए
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