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________________ देश ५ए ॥ म दिघम्मि दिहिजुयलेण । हरिसुन सिरसरीरा माया पियरो सर्दु जाया ॥ १५७ ॥ सम्मायि बहुमालि य सवोऽवि सय जणवग्गो । बन्नालंकाराईपयार्ड परमविषएण ॥ १७८ ॥ बोगस मिद्धिं समधुवंतस्स तस्स कुमरस्त । जाया तया विश्यालकियतपुणो सुरुवा || १७९ ॥ asari विड़ियंत्रणा विजयवऊणपुरम्मि । अप्पा धन्नतमं श्रन्नदियं मन्नमाषेण ॥ १०० ॥ विणिवेत् कुमारं कयावि रम्मि कोससम्मि । धम्महासु तदेव हीदी ऐसु नियदवं ॥ १०१ ॥ दमघोसायरिया तप्पुन्नप्पेरणागया वो । पासे पवन सिरिं पवन पुन्नदरण ॥ १०२ ॥ युग्मम् ॥ चिरकालं पालिय संजमं च परकालियामलपूरं । तियसायमालयसयण मोहर हि समपत्तो ॥ १८३ ॥ मणुदरयणचंदो चंदोब समुद्रालो जसकरेहिं । श्रदइ चटरघउरचकमरिचकडुडो ॥ १०४ पास समासो दाल रिजवरसकसमसेसं । बहुमन्नइ धम्मियजएमलग्गलं रकमणुकलइ ॥ १०५ ॥ पुरिसेोगेण स अन्नयंत्र दिवसे समेच्च विन्नत्तो । देव दयासुंदरनामयम्मि समपुन्नाऐ ॥ १०६ ॥ संपत्तो सत्तामदमोदह रियालिसजलजलवाहो । दमघोसमुणिवरिंदो चंदो इव सोमखेसागो ॥ १०५ ॥ पितु पारितोसियममस्स दाएं धांसुयपदाएँ । यह एस सयं चलित बंदवमियाइ सुगुरूणं ॥ १०० ॥ तिपया हि करिता वंदित्ता सग्गुरुण पयकमखं । समुचियजूमिपएले श्रासीणो विषयपणयसिरो ॥ १८५ ॥ १ चतुरचकोरचक्रम् २ रिपुवर्गजं भयम् ३ अन्यदाऽन्यदिवसे. ४ घनांशुकमधानम्. 118 सप्ततिका. ॥ ५ए ॥
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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