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चतुर्थ अध्ययन श्रमणोपासक सुरादेव
उक्खेवओ धउत्थस्स अज्झयणस्स एव खलु.जबू! ते णे काले तेणं समएणं वाणारसी णाम णपरी, कोहए चेहए, जियसत्तु राया, मुरादेषे गाहावई अड्डू, छ हिरण्णकोडीओ जाव उ वया दसगोसाहस्सिएणं पएणं, घण्णा मारिया, सामी समोसवे, जहा माणको तहेच पहिषज्जह गिहिधम्म, अहा कामदेवो जाय समणरस भगवओ महावीरस्स धम्मपण्णति उपसंपज्जित्ताणं विहरइ ।। सू. ३० ॥
___अर्थ-बोये अध्ययन का उत्थान-भगवान सुधर्मास्वामी फरमाते है-हे जं। उस काल उस समय में श्रमण भगवान महावीर स्वामी विचर रहे थे, तब बागारसी मामक नगरी पी, कोष्ठक उद्यान था, जितशत्र राजा राज्य करते थे, यहाँ 'सुरादेव' नामक गायापति रहते थे। उनके छ: करोड़ का धन निधान में, छ: करोष व्यापार में, सपा छः करोड़ की घरबिखरी थी। दस हजार गार्यो के एक ब्रज के हिसाब से छः प्रज थे। घना नामक पत्नी यो । उस समय अमण-भगवान महावीर स्वामी दाणारसी पधारे। आनन्द को मांति सुरादेव ने भी धर्म सुन कर मावक-धर्म स्वीकार किया और कामदेव की मोति पौषधयुक्त होकर भगवान् की धर्मप्राप्ति का पालन करने लगे।
तए णं तस्स सुरादेवस्स समणोषासयरस पुनवरत्तापरत्तकालसमय सि एगे देवे अंलियं पाउम्भरित्या से देवे पर्ग महं पीलुप्पल जाव असिं गहाय सुरादेवं समणोषासर्य एवं षयासी-" भो सुरादेवा समणोवासया ! अपस्थियपस्थिया ४ जाणं तुम सीलाई जाव ण भंजसि तो ते जेडं पुत्तं साओ गिहाओ गाणेमि, णीमेत्ता तष अग्गओ घाएमि, घाएत्ता पंच मंससोल्लए करेमि, आदाणभरियसि