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________________ मानाम्दामगोपासक-पत-प्रतिज्ञा तयाणतरं च णं विलेखणविहिपरिमाणं करेइ, पापणत्य अगरुकुंकुमचंदणमाइहि अबसेसं विलेयणधिहि पच्चक्खामि ३ । मर्थ-आनन्धमी पिलेपन विधि का परिमाण करते हैं अगर, कुंकुम मोर बन्दन आवि के अतिरिक्त शेष विलेपन विधि का प्रत्याख्यान करता हूँ। तयाणंतरं च णं पुष्फविहिपरिमाणं करेइ, गण्णत्व एगेणं सुद्धपउमेण मालाकुसुमदामेणं वा, अवलेस पुष्फविदि एच्चक्खामि ३। मर्थ-तवन्सर वे पुष्पविधि का परिमाण करते है --कमल छ मालती के फूलों के सिवाय शेष फूलों का त्याग करता हूँ। नयागंतरं च णं आमरणविहिपरिमाणं करेइ, पण्णय महकपणेज्जएहि णाममुदाप य, अव सेस आभरणविहिं पथक्खामि ३ । अर्थ--भामरणविधि का परिमाण करते है--में कानों के कुण्डल एवं नामांकित मुनिका (अंगूठो) के अतिरिग्त शेष आभूषण पहनने का त्याग करता हूँ। तयाणतरं च णं धूवणविहिपरिमाणं करेड, णण्णस्थ अगरुतुरुक्कधूषमाइपहि, अव सेसं धूवणविहिं पच्चक्खामि ३ । अर्थ--वे धूपन विधि का परिमाण करते हैं--प्रगक, तुमक (संभवतः लोबान) भाषि के सिवाय शेष धूपन विधि का प्रत्यारपान करता हूँ। तयाणतरं च णं भोयणविहिपरिमाणं करेमाणे (अ) पेज्जविहिपरिमाणं करेइ, गण्णत्व एगाए कहपज्जाए भबसेसं पेजविहि पच्चक्खामि ३। (आ) तयाणंतरं च णं भक्खणविहिपरिमाणं करेइ, णण्णत्व एगेहि पपपुणेहि खंडखजहि था, अक्सेसं भक्षणविहिं पच्चक्लामि ३ ।
SR No.090457
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashakdashang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhisulal Pitaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sadhumargi Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year
Total Pages142
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Literature, & agam_upasakdasha
File Size3 MB
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