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________________ श्री उपासकदणांग सूत्र १ () नयाणतरं च णं ओदणविहिपरिमाणं करे, णण्णत्य कलमसालिओवणेणं, अवसेसं ओदणविहि पच्चक्खामि। (ई) नयाणतरं च णं सूवविहिपरिमाणं करेइ, णण्णस्य कलायसूत्रेण वा मुग्गमाससूवेण वा, अक्सेसं सूचविहि पञ्चपखामि ३ । (उ) तयाणतरं च णं घयविहिपरिमाणं करेइ, णपणत्थ मारहपणं गोधय. मंडेणं, अवलेसं घयविपि पच्चक्यामि ।। (ऊ) तयाणंसरं च णं सागविहिपरिमाण करेइ, णण्णस्थ वत्थुसाएण था, सुत्थियसापण वा मंडुक्कियमारण पा, अब सेसं सागविहि पच्चक्खामि ३।। (ए) तयाणसरं च ममारविहिपरिमाणं करेइ, णपणत्य एगेणं पालंगा. माहरगण अबसेसं माहरयविहिंपच्चक्खामि ३। (गे) तयाणंतरं ष णं जेमणविष्ट्रिपरिमाणं करेग, णण्णस्थ सेहंपदालियं. बेहि, अवसेस जेमणविहि पच्चस्वामि ३ । (ओ) तयाणंतरं च ण पाणियचिहिपरिमाणं करेह, णण्णस्थ एगेणं अंतलिक्खोदएण, अवसेस पाणियविहि पच्चक्खामि ३ । (ओ) नपाणसर च ण मुहवासविहिपरिमाणं करेइ, णपणत्य पंचसोगंधिएण संधोलेणं, अब सेमं मुहवासविहि पच्चक्खामि ३ । अर्थ--इसके बाद आनन्दजी मोजनविधि का परिमाण करते हए--- (अपेयधिधि का परिमाण करते हैं--में उबाले हए मंग का अस (पानी) और घी में तले चावलों के पेय के अतिरिक्त शेष पेय विधि का प्रत्याख्यान करता हैं। (आ) भक्षणविधि का परिमाण करते हैं-मैं घेवर व मीठे खाजों के अतिरिक्त शेष (मिष्ठान्न पक्षणविधि का प्रत्याख्यान करता है। (इ) ओदविधि का परिमाण करते है--में कलमशालि (चामल विशेष के अतिरिक्त शेष ओवणविधि का प्रत्यासान करता हूं। (६)सुपविधि का परिमाण करते हैं--में बने, मंग और उाद की दाल के सिवाय घोष चिधि का प्रत्याख्यान करता हूँ।
SR No.090457
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashakdashang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhisulal Pitaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sadhumargi Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year
Total Pages142
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Literature, & agam_upasakdasha
File Size3 MB
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