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________________ मानव श्रमणीपरसक प्रत-प्रतिज्ञा गमन के लिए तथा पांच सौ .छकई अण-काष्ठ-धान्यादि ढोने के लिए। अवशेष सब शकट-विधि का प्रत्याख्यान करता है। तदनन्तर जलयान (जहाज) विधि का परिमाण करते हैं-'में चार जहाज यात्रा के लिए तथा चार जहाज माल ढोने के लिए रख कर अवशेष यानविधि का प्रत्याख्यान करता हूँ।' तयाणंतरं च णं उवभोगपरिभोगविहिं पच्चक्खायमाणे उल्लणियाधिहि. परिमाणं करेड़, णपणत्थ पगाए गंधकासाईप, अवसेसं सवं उल्लणियाविहिं पच्चक्खामि । अर्थ -सातवें व्रत में सर्वप्रथम आननयनिका विधि का परिमाण करते हैं-सुचित काषाविक वस्त्र के सिवाय अवशष आननिकाविधि का प्रत्यारपान करता है। विवेचन - जल मे भीगे शरीर को पोंछने के काम में भाने वाले मंगोछे आदि की मर्यादा 'उल्लगियायिहि परिमाण' कहा जाता है । नगाणंतरं घणं दंतवणविहिपरिमाणं करेइ, णण्णस्थ एगेणं अल्ललट्ठीमहुगणं अवसेसं पंतवणविहि पच्चक्खामि ३ । अर्थ-वातुन विधि का परिमाण करते हैं-में मावलष्ठिमधुक के सिवाय शेष बातुन विधि का प्रत्याख्या करता है। विवेचन-पा---गीली, लष्टि--लकड़ी, मधुक- मुलेठी या जेठी । हरी मुलेठी की लकड़ी के सिवाय शा वस्तुओं से दातुन करने का प्रानंदजो ने त्याग किया। नयाणंतरं च णं फलविहिपरिमाणं करेह, अण्णस्य पगेणं खीरामलपणं, अब लेसं फलविहि पञ्चक्खामि | अर्थ-फलविधि का परिमाण करते हैं-क्षीर-आमलक के अतिरिक्त शेष फल विधि का प्रत्याख्यान करता हूँ। विवेचन - दूध के समान मीठे भावलों को 'सौरामलक' कहा जाता है। नपाणंतरचणं अन् गणविहिपरिमाणं करेह, णण्णस्थ सयपागसहस्सपागेहि
SR No.090457
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashakdashang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhisulal Pitaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sadhumargi Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year
Total Pages142
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Literature, & agam_upasakdasha
File Size3 MB
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