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________________ श्री उपासकदाग सूत्र १ करते हैं-'चार करोड़ स्वर्णमुद्राएँ मजार में, चार करोड़ व्यापार में, चार करोड़ की घर-बिखरी । इसके अतिरिक्त शेष हिरण्य-स्वर्ण-विधि का प्रत्याख्यान करता हूँ।' इसके बाद चतुष्पद-विधि का परिमाण करते है-'वस हजार गार्यों का एक बज, ऐसे चार बज के अतिरिक्त शेष पशु-धन का प्रत्याख्यान करता हूँ। तयाणतर घणं खेत्तपत्थुविहिपरिमाणं करेह, णपणत्य पंचहि हलसहि नियत्तणसइएणं हलेणं, अबसेसं सब्बखेतवत्थुधिहि पच्चक्खामि ३ । सपाणतरं च णं सगडविहिपरिमाणं करेइ. णपणत्य पंचहि मगठसहि दिसा. यत्तिपहिं, पंचहि सगइसराह संवाहणिएहिं अवसेस सञ्चं सगइवि पध्यक्खामि ३१ तयाणतरं च ण वाठणविहिंपरिमाणं करेइ, पणत्य चउर्षि वाहणा दिमायतिपहिं च वाहणेहि संवाहणिपाहें, अवलेस सर्व वाहणविहि पच्चक्खामि । अर्थ-तवनन्तर आनन्दजी क्षेत्र-वास्तु विधि का परिमाण करते हैं--'सो निवर्तन : का एक हल, ऐसे पांच सौ हल उपरान्त अवशेष सभी क्षेत्र-वस्तु विधि का प्रत्याख्यान करता हूँ।' तदनन्तर शफट-विधि का परिमाण करते हैं--पांच सौ छकई {गाड़े। यात्रार्थ गमना. * थी धागोलाम मातीमाल शाह अहमदाबाद दाग प्रकाशिन उपागकदशा के अर्थ की प्रति हमारे गाम है। सं. १८४ जे के आधार से नियतण'-निवत्तंन का परिमाण । शास्त्रीद्वारा पूज्य श्री अमानक रिमोम. ने अपने उपासकदशा प...पर पावटिप्पणी में एक संत श्लोमा व उसका अर्थ यस प्रकार दिया है __ " दगाकर भवन बंमा, वंशवीमें नियतन। निवर्तम शन मान, हनं क्षेत्र समने Jई" " अति-दन हाथ का एक धाग, वीम बाँस का एक निवर्तन, मी नियतन का एफ इल, गला सीनावनों में है। अब हम पात्र मी हल का नाप निकाल सकते है.. दम हान एक बाम । बोम बास-दो मौ हाय-फ निवतन । मो निवतंग-२२०. बांस-२०.०० हार-एक हल । चार हाचक धनुष, दो हजार घनुष-एक कोम, यानि ... हाथ का एक काम, नो बोम हमार हाथ की लम्बाई दाई कोस हुई । एक शाम में काई कोस मी गांच मो हाल में साई बारह गो काम जर्मान हुई। उपरोका श्लोक का शुद्ध रूप यह है-दणफर भवन चंग, विराय मो भिवन्तम् । नियतन शनानम्, हलवे म्मन उधः । ['निवनन ' शव का अर्प ' मम्क्रन शर्थ कौतुम' पृ... में इस प्रकार दिया है-" मी ग पमि अथवा २० गाम लम्बी मसह "-डोगी]
SR No.090457
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashakdashang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhisulal Pitaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sadhumargi Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year
Total Pages142
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Literature, & agam_upasakdasha
File Size3 MB
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