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________________ श्री सम्मेदशिखर माहात्म्य = एक हाथ एकहस्तोन्नतिस्तत्र शुक्ललेश्याधरो विभुः । अहमिन्द्रत्वमापन्नः सो हि रराज वरवीयर्तः ||१६|| अन्वयार्थ तत्र - उस सर्वार्थसिद्धि में, एकहस्तोन्नतिः ऊँचाई प्रमाण वाले, शुक्ललेश्याधर = शुक्ललेश्या को धारण करने वाले, सः = वह, विभुः प्रभु, अहमिन्द्रत्वं = अहमिन्द्रपने को. आपन्नः प्राप्त हुये, वरवीर्यतः = शुभशक्ति से, हि = ही, रराज = शोभित हुये । = ५०६ - श्लोकार्थ - उस सर्वार्थसिद्धि में एक हाथ ऊँचाई वाले शुक्ललेश्या के धारी वह प्रभु अहमिन्द्र पद को प्राप्त हुये शुभशक्ति से सुशोभित हुये । त्रयस्त्रिंशत्समुद्रोक्तमायुः सम्प्राप्य तत्र सः । शोकनाशनजियासबलवीर्यसमन्वितः । ।१७ || प्रकुर्वन् सप्ततत्त्वानां चर्चा तत्र स्थितेषु वै । अनादिभूतसिद्धानां पदान्युच्चैर्व्यभावयन् ।। १८ ।। एवं व्यतीत्यायुष्यं षण्मासावधिजीवनः | भोगादप्यतुलान्नूनं विरक्तस्तत्र संस्थितः ।। १६ ।। = अन्वयार्थ - तत्र = वहाँ सर्वार्थसिद्धि में त्रयस्त्रिंशत् = तेतीस समुद्रोक्तं = सागर प्रमाण कही गयी, आयुः = आयु को सम्प्राप्य = प्राप्त करके यथोक्ताशननिश्वासबलवीर्यसमन्वितः = जैसा कथित है तदनुसार भोजन, श्वासोच्छवास और बल वीर्य आदि से युक्त होता हुआ, सः उस देव ने सप्ततत्त्वानां = सात सत्त्वों की. चर्चा = चर्चा को प्रकुर्वन् करते हुये. तत्र = वहाँ, स्थितेषु स्थित रहने वाले समय में, वै यथार्थरूप से, अनादिभूत सिद्धानां अनादि से हुये सभी सिद्धों के अथवा अनादि से सिद्ध स्वरूप है स्वभाव जिनका ऐसे स्वयं सिद्ध परमात्माओं के पदं स्वरूप आदि पदों को, उच्चैः = उत्कर्ष से व्यभावयन् = विशेषता सहित विचारा अर्थात् चिन्तवन किया एवं इस प्रकार, आयुष्यं = अपनी आयु को व्यतीत्य = बिताकर षण्मासावधिजीवनः = छह माह = - . = 1 - =
SR No.090450
Book TitleSammedshikhar Mahatmya
Original Sutra AuthorDevdatt Yativar
AuthorDharmchand Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages639
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Pilgrimage
File Size12 MB
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