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________________ त्रयोदशः ३७३ अन्वयार्थ - एकदा = एक बार, सौधम् = महल पर आरुह्य = चढ़कर, सिंहासनगतः - सिंहासन पर बैठे हुये प्रभुः = स्वामी ने तारापातं = तारे का गिरना, ददर्श . = देखा, अथ = उसके वैराग्यभाव को प्राप्त. बाद, तत्क्षणात् = उसी समय, विरक्तः अभूत् हो गया। = = = = = = = = इस एषः = यह संसार संसार भी तारापातवत् तारों के गिरने के समान, क्षणभङ्गुरः = नाशवान् या क्षणिक, (अस्ति - है), अत्र = इस संसार में, मूढाः मूर्खजन, प्रमाद्यन्ते = प्रभाव का कार्य करते हैं, आत्मवन्तः = आत्मज्ञानी, बुधाः विद्वज्जन, न नहीं, वैसचमुच, दुर्लभं = कठिनता से प्राप्त, नरत्वं = मनुष्यपना को प्राप्य = प्राप्त करके, महात्मनां महापुरूषों के लिये, सारं = सारभूत, तपः = तपश्चरण, ( अस्ति - है) तपसा = तपश्चरण से, कर्मनाशः कर्मों का नाश, स्यात् = होता है, कर्मनाशात् कर्मों का नाश हो जाने से. परं = उत्कृष्ट, पर्व स्थान हो) इति प्रकार, चिन्तयतः = विचार करते हुये, तस्य = उन प्रभु का, स्तवार्थं = स्तवन करने के लिये, सारस्वतादयः - सारस्वत आदि. सुरसत्तमाः श्रेष्ठ देवगण, तेजोभिः = प्रकाश से, भास्कराः = सूर्य के इव = समान, प्राप्ताः = उपस्थित हुये, तदा तभी स्वावधिज्ञानात् = अपने अवधिज्ञान से, तपः = तपश्चरण को, कर्तुं = करने के लिये, समुद्यतं = तैयार, देव प्रभु को ज्ञात्वा = जानकर इन्द्रः = इन्द्र, अपि = देवसन्निधिं = प्रभु की समीपता को प्राप = प्राप्त हुआ । तदा = उसी समय, सागरदत्ताख्यां = सागरदत्त नाम की, शिबिकां = पालकी पर, समारुह्य = चढ़कर (च = और), समुत्सय = उत्साहित होकर देवसंस्तुतः = देवताओं द्वारा स्तुति किया जाता हुआ, सः वह देव सहेतुकं सहेतुक नामक, वनं = वन को, ययौ चले गये। श्लोकार्थ एक बार उन राजा ने महल के ऊपर सिंहासन पर बैठे हुये तारों का गिरना देखा जिससे वह उसी क्षण विरक्त हो गये और विचार करने लगे यह संसार भी तारापात के समान . = = - = H = - भी
SR No.090450
Book TitleSammedshikhar Mahatmya
Original Sutra AuthorDevdatt Yativar
AuthorDharmchand Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages639
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Pilgrimage
File Size12 MB
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