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________________ अथ द्वादशोऽध्यायः विमलो ज्ञानसम्पन्नो विमलो विमलद्युतिः । माना पिललायो नः कुशराद्विमलं मनः ।।१।। अन्वयार्थ – विमलः = विमलनाथ, ज्ञानसम्पन्नः = ज्ञान से समृद्ध सम्पन्न हैं, विमलः = विमलनाथ, विमलद्युतिः = विमल अर्थात स्वच्छ धवल कान्ति वाले हैं, नाम्ना = नाम से. (अपि = भी), विमलनाथः = विमलनाथ, नः = हमारे. मनः = मन को, विमलं = निर्मल अर्थात् राग -द्वेष से रहित, कुरुतात् = करें। श्लोकार्थ – विमलनाथ तीर्थङ्कर केवलज्ञान से सम्पन्न हैं तथा विमल अर्थात् स्वच्छ धवल कान्ति से सुशोभित हैं ऐसे नाम से भी विमलनाथ जी हमारे मन को विमल कर दें। धन्यो जिनस्त्वं विमलो धन्योऽसौ जैनधार्मिकः । धन्य इक्ष्वाकुवंशश्च धन्या सा कम्पिलापुरी।।२।। अन्वयार्थ – विमलः = विमलनाथ. जिनः = जिनेन्द्र, त्वं = तुम, धन्यः = धन्य, (असि = हो), असौ = वह, जैनधार्मिक:= जैनधर्म का पालन करने वाला, धन्यः = धन्य. (अस्ति = है), इक्ष्वाकुवंशः = इक्ष्वाकुवंश. धन्यः = धन्य, (अस्ति = है), च = और, कम्पिलापुरी = कम्पिलानगरी नामक, सा = वह नगरी, धन्या = धन्य. (अस्ति = है)। श्लोकार्थ – हे विमलनाथ जिनेन्द्र! तुम धन्य हो, वह जैनधार्मिक इक्ष्वाकुवंशे और कम्लिानगरी भी धन्य है। यद्वागादर्शमध्येऽत्र भासते निखिलं जगत् । तस्मै विमलनाथाय प्रणामो मे त्रिकालतः ।।३।। अन्वयार्थ – अत्र = इस भारत भूमण्डल पर, यहागादर्शमध्ये = जिनके वचन रूपी दर्पण में, निखिलं = सम्पूर्ण, जगत = संसार, भासते = प्रतिमासित होता है, तस्मै = उन, विमलनाथाय =
SR No.090450
Book TitleSammedshikhar Mahatmya
Original Sutra AuthorDevdatt Yativar
AuthorDharmchand Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages639
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Pilgrimage
File Size12 MB
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