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________________ २३८ श्री सम्मेदशिखर माहात्म्य अन्वयार्थ – एवं = इस प्रकार स्वप्नों को, विलोक्य = देखकर, प्रबुद्धा = जागी हुयी, सा = वह रानी, पत्युः = पति के, अन्तिकं = पास, गता = गयी, अथ = फिर, तस्मात् = पति से, स्वप्नफलं = स्वप्नों का फल, श्रुत्वा = सुनकर, मानसे - मन में, अतीव = अत्यधिक जहर्ष = प्रसन्न हुई। श्लोकार्थ – इस प्रकार स्वजों को देखकर जागी हुई वह रानी राजा के पास गयी तथा राजा से स्वप्नों का फल जानकर-सुनकर मन में अत्यंत प्रसन्न हुई। धृत्वा गर्भेऽहमिन्द्रं सा रराज विशदद्युतिः । राकेव निता व्योलि सादी निशीपाला 1३१|| अन्वयार्थ – विशदद्युतिः = निर्मल कान्ति सम्पन्न, गर्भ = गर्भ में, अहमिन्द्रं = अहमिन्द्र को, धृत्वा = धारण कर, गर्भिता = गर्ग युक्त, सा = वह रानी, व्योम्नि = आकाश में, शारदीयनिशोज्ज्वला = शरत्काल की रात्रियों में चमकती-दमकती स्वच्छ, राकेव = पूर्णिमा की रात्रि के समान, रराज = सुशोभित हुई। श्लोकार्थ – अपने गर्भ में अहमिन्द्र को धारण कर गर्मयुक्त हुयी निर्मल कान्ति से सम्पन्न वह रानी उसी प्रकार सुशोभित हुई जैसे आकाश में शरत्काल की रात्रियों में पूर्णतः चमकती-दमकती पूर्ण स्वच्छ पूर्णिमा की रात्रि सुशोभित होती है। सहस्यशुक्लैकादश्यां सुषुवे पुत्रमुत्तमम् । सा देव्यथ त्रिलोकीशं मतिश्रुत्यवधीश्वरम् ।।३२।। अन्वयार्थ – सा = उस, देवी = रानी ने, सहस्यशुक्लैकादश्यां = पौषशुक्ला ग्यारस के दिन, मतिश्रुत्यवधीश्वरं = मति-श्रुत और अवधिज्ञान के स्वामी, उत्तम = उत्तम. त्रिलोकीशं = तीन लोक के प्रभु तीर्थङ्कर, पुत्रं = पुत्र को, सुषुवे = जन्म दिया । __श्लोकार्थ – उस रानी ने पौष शुक्ला ग्यारस के दिन मति, श्रुत और अवधिज्ञान स्वामी, उत्तम, त्रिलोकीनाथ तीर्थङ्कर पुत्र को उत्पन्न किया।
SR No.090450
Book TitleSammedshikhar Mahatmya
Original Sutra AuthorDevdatt Yativar
AuthorDharmchand Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages639
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Pilgrimage
File Size12 MB
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